अल्मोड़ा का ‘ऊंट प्रकरण’ पहुँचा हाई कोर्ट: प्रशासन और NGO की कार्रवाई को चुनौती, अधिवक्ता विनोद चंद्र तिवारी लड़ेंगे ‘प्रो बोनो’ केस
अल्मोड़ा का ‘ऊंट प्रकरण’ पहुँचा हाई कोर्ट: प्रशासन और NGO की कार्रवाई को चुनौती, अधिवक्ता विनोद चंद्र तिवारी लड़ेंगे ‘प्रो बोनो’ केस
न्यायिक मोड़:* ऊंट स्वामी शाहिद अंसारी ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में दायर की आपराधिक रिट याचिका।
बड़ा आरोप: बिना निष्पक्ष जांच और सुनवाई का अवसर दिए प्रशासन ने जल्दबाजी में की कार्रवाई।
Prevention of Cruelty to Animals Act की धारा 29 के तहत दोषसिद्धि से पहले अभिरक्षा छीनने पर उठाए सवाल।
वरिष्ठ वकीलों का साथ: अधिवक्ता विनोद चंद्र तिवारी के साथ वरिष्ठ अधिवक्ता प्रभाकर जोशी और भूपेश सिंह बिष्ट भी देंगे सहयोग।
अल्मोड़ा 4 जुलाई 2026। अल्मोड़ा का बहुचर्चित ‘ऊंट प्रकरण’ अब कानूनी लड़ाई में तब्दील हो चुका है। ऊंट स्वामी शाहिद अंसारी की ओर से आज उत्तराखंड उच्च न्यायालय (नैनीताल) में एक आपराधिक रिट याचिका दायर कर प्रशासन द्वारा दर्ज की गई एफआईआर संख्या 63/2026 और उसके बाद की गई समस्त कार्यवाहियों को कड़ी चुनौती दी गई है। इस संवेदनशील और जनहित से जुड़े मामले की पैरवी प्रसिद्ध अधिवक्ता विनोद चंद्र तिवारी ‘प्रो बोनो’ (निःशुल्क जनहित सेवा) के रूप में कर रहे हैं।
वरिष्ठ अधिवक्ताओं का मिला सहयोग, इन पक्षों को बनाया प्रतिवादी
यह याचिका अधिवक्ता विनोद चंद्र तिवारी द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता प्रभाकर जोशी और वरिष्ठ अधिवक्ता भूपेश सिंह बिष्ट के विधिक सहयोग से प्रस्तुत की गई है। याचिका में उत्तराखंड राज्य, सचिव (पशुपालन विभाग), जिलाधिकारी अल्मोड़ा, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) अल्मोड़ा, उप जिलाधिकारी (SDM) अल्मोड़ा, थानाध्यक्ष कोतवाली अल्मोड़ा, मामले के विवेचक, निजी एनजीओ
“Help in Suffering” और शिकायतकर्ता महिला को प्रतिवादी बनाया गया है। याचिकाकर्ता ने इन सभी की भूमिका की न्यायिक समीक्षा करने और उचित कानूनी आदेश पारित करने की मांग की है।
स्वस्थ थे ऊंट, फिर भी जबरन छीन ली अभिरक्षा: याचिका
याचिका में प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि बिना किसी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच के, जल्दबाजी में कार्रवाई करते हुए याचिकाकर्ता के दोनों ऊंटों को कब्जे में लेकर एक निजी एनजीओ को सौंप दिया गया।
सरकारी पशु चिकित्साधिकारी की मेडिकल जांच में दोनों ऊंट पूरी तरह स्वस्थ पाए गए थे। इसके बावजूद याचिकाकर्ता को अपनी बात रखने या प्रभावी सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया गया और उनकी अभिरक्षा छीन ली गई।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि 23 जून 2026 को शिकायतकर्ता महिला ने याचिकाकर्ता से एक लिखित दस्तावेज पर जबरन हस्ताक्षर/अंगूठा निशान लिए थे। इसके साथ ही, याचिका में 28 जून 2026 की उस घटना का भी जिक्र है जब याचिकाकर्ता अपने वकील के साथ जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपने गया था, लेकिन आरोप है कि न सिर्फ ज्ञापन लेने से इनकार किया गया, बल्कि अधिवक्ता के साथ दुर्व्यवहार भी हुआ।
पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (1960) की व्याख्या पर सवाल
याचिका में Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960 की धारा 29 का विशेष हवाला दिया गया है। इसके अनुसार, जब तक सक्षम न्यायालय द्वारा कोई व्यक्ति दोषी सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक उसे उसके पशुओं की अभिरक्षा से वंचित करना कानूनन सही नहीं है। इसी आधार पर हाई कोर्ट से एफआईआर को निरस्त करने, ऊंटों की अंतरिम अभिरक्षा तुरंत मालिक को सौंपने और याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी दंडात्मक या बलपूर्वक कार्रवाई पर रोक लगाने की गुहार लगाई गई है।
“यह विधि के शासन और नागरिक अधिकारों की रक्षा का मामला है”
इस मामले को बिना किसी स्वार्थ के लड़ने का निर्णय लेने वाले अधिवक्ता विनोद चंद्र तिवारी ने कहा:”यह मामला केवल एक व्यक्ति या दो ऊंटों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे संविधान, कानून के शासन (Rule of Law) और देश के प्रत्येक नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा का प्रश्न है। जब भी कोई प्रशासनिक अथॉरिटी कानून के दायरे से बाहर जाकर मनमानी और दमनकारी कार्रवाई करेगी, तब-तब न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया जाएगा। हमें पूरा भरोसा है कि माननीय उच्च न्यायालय नागरिक के अधिकारों का संरक्षण करेगा और शक्तियों का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी नियमानुसार कार्रवाई होगी।”
विधिक और सामाजिक हलकों में बढ़ी हलचल
हाई कोर्ट में इस याचिका के दायर होने के बाद अब पूरे उत्तराखंड के विधिक विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों और आम जनता की नजरें नैनीताल उच्च न्यायालय पर टिक गई हैं। आने वाले दिनों में होने वाली सुनवाई इस मामले में प्रशासन और एनजीओ की जवाबदेही तय करने में बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी।