Uttrakhand News:टिहरी गढ़वाल के 940 गांव भूस्खलन के खतरे में, 6 गांव अतिसंवेदनशील: संयुक्त वैज्ञानिक अध्ययन

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ताजा विज्ञानी अध्ययन में सामने आई स्थिति, टिहरी का दक्षिणी, पश्चिमी और मध्य क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित-1600 पुराने भूस्खलनों से तैयार किया नया मानचित्र; गहरी जांच में नदी से दूरी सबसे बड़ा कारक सुमन सेमवाल, देहरादून।

टिहरी गढ़वाल में 940 गांव भूस्खलन के लिहाज से संवेदनशील हैं। वहीं, 06 गांवों को अतिसंवेदनशीलता के दायरे में रखा गया है। यह बात यूनिवर्सिटी आफ गौर बंगा (बंगाल), विद्यासागर यूनिवर्सिटी (बंगाल) और यूनिवर्सिटी आफ टेक्नोलाजी (आस्ट्रेलिया) के संयुक्त अध्ययन में सामने आई। जिसे स्पैशियल इंफार्मेशन रिसर्च में 23 जून 2026 को प्रकाशित किया गया।

भूस्खलन के लिहाज से गांवों को संवेदनशीलता के अध्ययन के लिए विज्ञानियों ने 1,600 पुराने भूस्खलन स्थानों और उन्हें प्रभावित करने वाले 17 भौगोलिक, जलवायु, मिट्टी, भूगर्भीय और मानवीय कारकों को मिलाकर पांच मशीन लर्निंग और डीप लर्निंग मॉडल से संवेदनशीलता मानचित्र तैयार किए। अध्ययन में टिहरी के दक्षिणी, पश्चिमी और मध्य हिस्सों को अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील पाया गया, जबकि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में संवेदनशीलता काफी कम रही।

1600 भूस्खलन स्थलों का जीपीएस से भी किया अध्ययन
शोधकर्ताओं ने 31 दिसंबर 2004 से 11 नवंबर 2022 के बीच उपलब्ध गूगल अर्थ चित्रों, पूर्व प्रकाशित अध्ययनों, सरकारी रिपोर्ट, समाचार रिपोर्ट और मैदानी सर्वेक्षणों से 1,600 भूस्खलन स्थान दर्ज किए। इन स्थानों का जीपीएस और उत्तराखंड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के ऐतिहासिक आंकड़ों से भी सत्यापन किया गया। मॉडल तैयार करने के लिए 1,120 भूस्खलन स्थान और परीक्षण के लिए 480 स्थान रखे गए।

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17 कारकों से पहाड़ की कमजोरी जांची
वैज्ञानिकों ने भूस्खलन के पीछे काम करने वाले 17 कारकों को मॉडल में शामिल किया। इनमें ढलान, ऊंचाई, ढलान की दिशा, धरातल की वक्रता, स्थलाकृतिक आर्द्रता सूचकांक, स्थलाकृतिक स्थिति सूचकांक, वार्षिक वर्षा, जलधारा शक्ति सूचकांक, नदी से दूरी, मिट्टी का प्रकार, मिट्टी की बनावट, मिट्टी की गहराई, भूविज्ञान, भूगर्भीय रेखाओं का घनत्व, भूमि उपयोग-भूमि आवरण, सड़क से दूरी और वनस्पति सूचकांक शामिल हैं।

इनमें नदी से दूरी सबसे प्रभावशाली कारक निकली। इसके बाद ऊंचाई, ढलान, वर्षा और वनस्पति सूचकांक का महत्वपूर्ण योगदान रहा। वैज्ञानिकों के अनुसार नदी के नजदीक कटाव और ढलान के आधार का कमजोर होना भूस्खलन की संभावना बढ़ा सकता है।

🌸940 गांव उच्च और अति-उच्च संवेदनशीलता वाले

अध्ययन में 1,853 गांवों का संवेदनशीलता मानचित्र के साथ विश्लेषण किया गया। इनमें लगभग 500 गांव यानी 27 प्रतिशत अति-उच्च भूस्खलन संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों में पाए गए। इसके अलावा करीब 440 गांव यानी 23 प्रतिशत उच्च संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों में स्थित मिले। यानी कुल मिलाकर लगभग 940 गांव उच्च या अति-उच्च संवेदनशीलता वाले क्षेत्र में आते हैं। अध्ययन में अति-उच्च संवेदनशीलता में विशेष रूप में लोल्डी, चांठी, घंडियालधार, पाली तल्ली और कांडी जेठुकी गांव को शामिल किया गया है।

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🌸संवेदनशीलता के ये कारण सामने

अध्ययन में नदी से दूरी को सबसे महत्वपूर्ण कारक पाया गया। इसके अलावा वर्षा और पानी से जुड़ी जलधारा शक्ति सूचकांक तथा स्थलाकृतिक आर्द्रता सूचकांक भी माडल में शामिल किए गए। वर्षा का पानी जमीन में प्रवेश करके मिट्टी और महीन सामग्री को नम करता है। टिहरी की कई जगहों पर यह सामग्री ढीले मलबे और नीचे मौजूद कठोर, मुड़ी हुई तथा भ्रंशयुक्त चूना पत्थर की सतह के बीच जमा हो सकती है। पानी से संतृप्त होने पर यह चिकनी परत फिसलन वाली सतह बन सकती है, जिस पर ऊपर का मलबा नीचे खिसक सकता है।

शोध में सड़क से दूरी और भूमि उपयोग-भूमि आवरण भी शामिल किए गए हैं। वैज्ञानिकों ने वनावरण में कमी, शहरी विस्तार और सड़क निर्माण को संवेदनशीलता बढ़ाने वाले मानवीय दबावों से जोड़ा है।

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