अल्मोड़ा: विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का 103वाँ स्थापना दिवस संपन्न; ‘सिल्वर रिवॉल्यूशन’ के बाद अब ‘जैविक पूंजी’ पर जोर

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अल्मोड़ा। भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (VPKAS) ने 4 जुलाई 2026 को अपना 103वाँ स्थापना दिवस बेहद धूमधाम से मनाया। इस अवसर पर आयोजित मुख्य समारोह और विशेषज्ञ पैनल चर्चा में पर्वतीय कृषि को तकनीक के माध्यम से बदलने और इसे वैश्विक पटल पर नई ऊंचाइयों तक ले जाने का संकल्प लिया गया।

 अल्मोड़ा: विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का 103वाँ स्थापना दिवस संपन्न; ‘सिल्वर रिवॉल्यूशन’ के बाद अब ‘जैविक पूंजी’ पर जोर
मुख्य बातें:
कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल के अध्यक्ष डॉ. संजय कुमार ने संस्थान को ‘विश्व राजधानी’ बनने योग्य बताया।

52 वर्षों के दीर्घकालिक प्रयोगों से सोयाबीन-गेहूं फसल प्रणाली की पैदावार में 4.6 गुना वृद्धि दर्ज।
‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत 3,025 किसानों को सीधा लाभ।
संस्थान के प्रकाशन “कृषक दिग्‍दर्शिका 2026-27” का विमोचन।
अल्मोड़ा, 4 जुलाई 2026।भाकृअनुप-विवेकानन्द पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का 103वाँ स्थापना दिवस संस्थान के अल्मोड़ा स्थित सभागार में गरिमामय तरीके से मनाया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ संस्थान के निदेशक डॉ. लक्ष्मी कान्त और अन्य गणमान्य अतिथियों द्वारा कुंदन हाउस के पूजागृह में अर्चना और स्वामी विवेकानन्द की मूर्ति पर माल्यार्पण के साथ हुआ।
 संस्थान की ऐतिहासिक उपलब्धियां और नई तकनीकें
संस्थान के निदेशक डॉ. लक्ष्मी कान्त ने संस्थान के संस्थापक प्रो. बोसी सेन को नमन करते हुए बीते वर्ष की विशिष्ट उपलब्धियों को साझा किया। उन्होंने बताया कि संस्थान ने पर्वतीय कृषि को सशक्त बनाने के लिए कई बेहतरीन तकनीकें और किस्में विकसित की हैं:

बायो-फोर्टिफाइड किस्में: ‘वीएल त्रिपोषी’ और ‘वीएल सुपोषिता’ जैसी मक्का की किस्में।
उन्नत फसलें: ‘वीएल मंडुआ 410’ और ‘वीएल लहसुन 2’।
मशीनीकरण: ‘वीएल मक्का शेलर’ तकनीक का विकास और इसके व्यवसायीकरण के लिए मैसर्स पराशर एग्रोटेक बायो प्राइवेट लिमिटेड, बनारस के साथ समझौता (MoU)।

दीर्घकालिक शोध:सोयाबीन-गेहूं फसल प्रणाली में 52 वर्षों के निरंतर प्रयोगों से पैदावार में 4.6 गुना वृद्धि दर्ज की गई है।
विस्तार कार्य: ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत 90 कार्यक्रमों के माध्यम से 3,025 किसानों (1,616 महिला कृषकों सहित) को सीधा लाभ पहुंचाया गया।
 “यह संस्थान कृषि क्षेत्र की विश्व राजधानी बनने योग्य” – डॉ. संजय कुमार
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और कृषि वैज्ञानिक चयन मंडल (नई दिल्ली) के अध्यक्ष डॉ. संजय कुमार ने ऑनलाइन माध्यम से जुड़कर संस्थान को बधाई दी। उन्होंने संस्थान की तुलना नालंदा से करते हुए कहा:

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 “जिस प्रकार नालंदा अपने ज्ञान के लिए विश्वविख्यात था, उसी प्रकार यह संस्थान अपनी अनूठी उपलब्धियों के कारण कृषि क्षेत्र की विश्व राजधानी बनने के योग्य है। देश को पहला संकर मक्का, प्याज, बेबीकॉर्न, द्विउद्देशीय गेहूं और सफेद मंडुआ इसी संस्थान ने दिया है।”उन्होंने जोर देकर कहा कि 21वीं सदी जैविक पूंजी (Biological Capital) की सदी है, जिसमें जंगल, नदियां और औषधीय पौधे ऐसी अक्षय पूंजी हैं जो कभी कम नहीं होतीं। उन्होंने वैज्ञानिकों से कृषि क्षेत्र में शीर्ष 10 प्राथमिकताएं तय कर मूल्य संवर्धन (Value Addition) और निर्यात पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया।

 व्याख्यान और विशिष्ट अतिथियों के विचार
छठा पद्मभूषण प्रो. बोसी सेन स्मृति व्याख्यान: विशिष्ट अतिथि डॉ. अवलोकितेश्वर सेन (पूर्व मुख्य वैज्ञानिक, CSIR-NCL, पुणे) ने ‘डिवाइन सोल – बोशी सेन एवं गर्ट्यूड इमरसन सेन’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने स्वामी विवेकानन्द, भगिनी निवेदिता और प्रो. जे.सी. बोस के जीवन से जुड़े प्रेरक प्रसंग साझा किए।

चुनौतियों को अवसर में बदला: पूर्व निदेशक डॉ. जे.सी. भट्ट ने हींग और क्विनोवा पर चल रहे शोध की सराहना की और स्थानीय बाजारों को मजबूत करने पर बल दिया।
जलवायु परिवर्तन पर नजर: पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष प्रकाश जोशी ने उम्मीद जताई कि संस्थान जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए जल्द ही प्रभावी विकल्प खोज निकालेगा।

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धर्म और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक: रामकृष्ण कुटीर के अध्यक्ष स्वामी ध्रुवेशानन्द ने कहा कि जिस हींग को हम विदेशों से मंगाते थे, आज उस पर अल्मोड़ा में शोध होना बेहद गर्व की बात है।
 प्रगतिशील किसान और वैज्ञानिक सम्मानित

स्थापना दिवस के अवसर पर संस्थान के नए प्रकाशन “कृषक दिग्‍दर्शिका 2026-27” का विमोचन किया गया। इसके साथ ही: प्रगतिशील कृषकश्रीमती गीता टम्टा एवं  जीवन लालको सम्मानित किया गया।
जून 2027 तक सेवानिवृत्त होने वाले 7 कार्मिको को सम्मानित किया गया।
 वर्ष 2025-26 के सर्वश्रेष्ठ शोध पत्रों के लिए डॉ. आर. पी. मीणा, डॉ. के. के. मिश्रा एवं डॉ. निर्मल कुमार हेडाऊ को प्रमाण-पत्र दिए गए।
समारोह के पूर्वाहन सत्र का समापन पारंपरिक ‘आम की दावत’ के साथ हुआ। कार्यक्रम का संचालन वैज्ञानिक डॉ. कामिनी बिष्ट एवं श्रीमती निधि सिंह ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. निर्मल कुमार हिडाऊ द्वारा किया गया।

दोपहर का सत्र: हिमालयी कृषि के पुनरुद्धार पर मंथन
अपराह्न सत्र में संस्थान की ITMU इकाई और बोशी सेन सोसाइटी के संयुक्त तत्वावधान में “हिमालयी कृषि का पुनरुद्धार: प्रौद्योगिकी-आधारित परिवर्तन का रोडमैप” विषय पर एक महत्वपूर्ण विशेषज्ञ पैनल चर्चा आयोजित की गई।
डॉ. संजय कुमार की अध्यक्षता में आयोजित इस चर्चा में देश के 13 शीर्ष कृषि विशेषज्ञों (जिनमें डॉ. जे.पी. टंडन, डॉ. एच.एस. गुप्ता, डॉ. श्याम कुमार शर्मा प्रमुख थे) ने हिस्सा लिया। विशेषज्ञों ने पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक तकनीक के तालमेल, टिकाऊ कृषि और किसानों की आय दोगुनी करने के लिए नए ‘कृषि-व्यवसाय मॉडलों’ पर एक ठोस नीतिगत ढांचा तैयार करने की रूपरेखा रखी। सत्र का संचालन डॉ. एन.के. हेडाऊ और डॉ. दिनेश जोशी ने किया।

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