Uttrakhand News:उत्तराखंड: अब स्कूलों और आंगनबाड़ियों में होगी बच्चों की डायबिटीज स्क्रीनिंग, RBSK कार्यक्रम में शामिल हुआ मधुमेह
अब स्कूलों में सिर्फ पढ़ाई नहीं, बच्चों की सेहत की भी खास निगरानी होगी। मधुमेह की बढ़ती चुनौती को देखते हुए सरकार ने पहली बार राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) में टाइप-1 और टाइप-2 डायबिटीज की स्क्रीनिंग को शामिल किया है।
इसके तहत प्रदेश के सरकारी स्कूलों व आंगनबाड़ी केंद्रों में पढ़ने वाले पांच लाख बच्चों की नियमित डायबिटीज जांच होगी। मधुमेह की संभावना पर बच्चों को जिला अस्पतालों के एनसीडी (गैर-संचारी रोग) क्लिनिक से जोड़कर इलाज की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी।
नई व्यवस्था के तहत आरबीएसके की मोबाइल हेल्थ टीम सरकारी स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों की स्क्रीनिंग करेगी। टीम में दो आयुष चिकित्सक, एक एएनएम या स्टाफ नर्स तथा एक फार्मासिस्ट शामिल होंगे।
बच्चों में बार-बार पेशाब आना, अत्यधिक प्यास लगना, लगातार थकान और अचानक वजन घटना जैसे चार प्रकार के लक्षण मिलने पर तत्काल रक्त शर्करा की जांच की जाएगी।
संदिग्ध बच्चों को जिला अस्पताल के एनसीडी क्लिनिक भेजा जाएगा, जहां फास्टिंग ब्लड शुगर, भोजन के दो घंटे बाद शुगर और एचबीए1सी जांच के आधार पर मधुमेह की पुष्टि की जाएगी।
टाइप-1 मधुमेह की पुष्टि होने पर बच्चे का तुरंत इंसुलिन उपचार शुरू किया जाएगा। वहीं टाइप-2 मधुमेह और प्री-डायबिटीज की भी स्क्रीनिंग होगी। शुरुआती उपचार के रूप में स्वस्थ खानपान, व्यायाम और जीवनशैली में सुधार पर सबसे अधिक जोर दिया जाएगा।
उत्तराखंड में बच्चों में डायबिटीज के कुल मामलों का कोई राज्यव्यापी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। एम्स ऋषिकेश से जुड़े एक अध्ययन में 16,344 बच्चों में 32 टाइप-1 डायबिटीज के मामले मिले और अस्पताल स्तर पर इसका प्रसार 1.95 प्रति 1,000 बच्चों दर्ज किया गया।
🌸इन बच्चों की होगी विशेष स्क्रीनिंग
मोटापा या अधिक वजन
शारीरिक निष्क्रियता
जंक फूड की अधिक आदत
परिवार में डायबिटीज का इतिहास
मां को गर्भावस्था में डायबिटीज
पीसीओएस, फैटी लिवर या हाई बीपी से पीड़ित बच्चे
‘बच्चों में मधुमेह के मामलों की समय पर पहचान बेहद जरूरी है। नई गाइडलाइन के अनुरूप राज्य में राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के माध्यम से स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों में स्क्रीनिंग की व्यवस्था को प्रभावी बनाया जा रहा है। इससे बीमारी की शुरुआती अवस्था में ही पहचान कर गंभीर जटिलताओं से बचाव संभव होगा।’
-विनय शंकर पांडेय, सचिव, स्वास्थ्य, उत्तराखंड