गिर्दा की पुण्यतिथि विशेष: ‘जैंता एक दिन त आलो…’ का सपना और आज का उत्तराखंड: कितना बदला, कितना अटका?
गिर्दा की पुण्यतिथि विशेष: ‘जैंता एक दिन त आलो…’ का सपना और आज का उत्तराखंड: कितना बदला, कितना अटका?
एक रिपोर्ट
“जैंता एक दिन त आलो, उ दिन यो दुनिया में…” (एक दिन वह सुंदर दिन इस दुनिया में जरूर आएगा) — जब हुड़का की थाप पर बुलंद आवाज में जनकवि गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ यह पंक्तियां गाते थे, तो आंदोलन के मैदानों में गूंज उठता था आम उत्तराखंडी का विश्वास। पृथक राज्य आंदोलन से लेकर जल, जंगल, जमीन को बचाने की लड़ाइयों तक, गिर्दा की कविताएं केवल पंक्तियां नहीं थीं, बल्कि सत्ता और शोषण के खिलाफ सीधे सवाल थीं।
आज 22 अगस्त को गिर्दा की पुण्यतिथि के अवसर पर पूरा प्रदेश उन्हें नमन कर रहा है। लेकिन इस श्रद्धांजली के साथ ही यह यक्ष प्रश्न भी हर किसी के जेहन में कौंध रहा है—जिस शोषण, गैर-बराबरी और अव्यवस्था के खिलाफ गिर्दा जी ने जीवन भर संघर्ष किया, क्या दो दशकों के बाद आज का उत्तराखंड उस दर्द से मुक्त हो पाया है?
सपनों का उत्तराखंड और आज की कड़वी हकीकत
राज्य तो बन गया, लेकिन जिन बुनियादी सवालों पर राज्य आंदोलन खड़ा हुआ था, वे आज भी जस के तस खड़े नजर आते हैं:
पलायन का दंश और खाली होते गांव: गिर्दा ने हमेशा चेताया था कि नीतियां ऐसी न हों जो पहाड़ की जवानी को पलायन पर मजबूर करें। आज प्रदेश के सैकड़ों गांव ‘भूतिया गांव’ में तब्दील हो चुके हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की तलाश में युवाओं का पलायन रुका नहीं है।
* पर्यावरण और विकास का संतुलन: “बात हमारे जंगलों की क्या करते हो…” लिखने वाले गिर्दा ने जोशीमठ जैसी आपदाओं और नदियों के अंधाधुंध दोहन की चेतावनी वर्षों पहले दे दी थी। बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स और अनियोजित निर्माण के चलते आज भी पहाड़ दरक रहे हैं और संवेदनशील पारिस्थिकी तंत्र खतरे में है।
* जल, जंगल और जमीन पर हक: गिर्दा की पंक्तियां “आज भले ही मौज उड़ा लो, नदियों को प्यासा तड़पा लो…” उस दौर में ही संसाधनों के व्योपारीकरण पर प्रहार करती थीं। आज सख्त भू-कानून और मूल निवास की मांग को लेकर प्रदेश का युवा एक बार फिर सड़कों पर है, जो दर्शाता है कि संसाधनों पर स्थानीय अधिकार का संघर्ष अब भी जारी है।
* सामाजिक विषमता और बेरोजगारी: हुड़का थामकर कुली, मजदूर और किसान की आवाज बनने वाले गिर्da का मानना था कि विकास का मापदंड आखिरी व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए। परंतु, आज भी राज्य के दूरस्थ क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव और युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी चिंताजनक है।
संघर्ष का मार्ग ही सच्चा नमन
जनकवि गिर्दा ने हमें सिखाया था कि लोकतंत्र में नागरिक की सबसे बड़ी ताकत उसकी सजगता और प्रतिरोध की क्षमता है। व्यवस्था बदली है, सरकारें बदली हैं, लेकिन जन-सरोकारों से जुड़े मुद्दे आज भी वही हैं।
गिर्दा को सच्ची श्रद्धांजलि केवल भाषणों और पुष्पार्पण से नहीं, बल्कि उनके द्वारा दिखाए गए जन-पक्षधरता के रास्ते पर चलकर ही दी जा सकती है—जहाँ विकास का मतलब केवल कंक्रीट के महल न हों, बल्कि पहाड़ के आम नागरिक का जीवन खुशहाल हो।