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हाईकोर्ट शिफ्टिंग मामला: वन भूमि और पहाड़ के हितों की अनदेखी पर याचिका, अब 20 अगस्त को होगी सुनवाई

विशेष संवाददाता
नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय को नैनीताल से हल्द्वानी स्थानांतरित (शिफ्ट) किए जाने के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई। हालांकि, राज्य सरकार के मुख्य अधिवक्ता (महाधिवक्ता) के न्यायालय में उपस्थित न हो पाने के कारण मामले में विस्तृत बहस नहीं हो सकी। न्यायालय ने इस संवेदनशील मामले की अगली सुनवाई के लिए 20 अगस्त की तिथि नियत की है।

गौरतलब है कि राज्य आंदोलनकारी संघ के अध्यक्ष रमन शाह ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर हाईकोर्ट की शिफ्टिंग की प्रक्रिया और इसके लिए चुनी गई भूमि को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। याचिका में कहा गया है कि उत्तराखंड राज्य का गठन पर्वतीय क्षेत्रों के सर्वांगीण विकास और आंदोलनकारियों के सपनों को पूरा करने के लिए हुआ था। राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी स्थायी राजधानी को लेकर भ्रम बना हुआ है और गैरसैंण पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है।

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ऐसे में नैनीताल से हाईकोर्ट को मैदानी क्षेत्र हल्द्वानी ले जाना पहाड़ के हितों के स्पष्ट विपरीत है।
वन संरक्षण नियमों के उल्लंघन का आरोप
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई है कि जिलाधिकारी द्वारा मई माह में जिस भूमि को हाईकोर्ट निर्माण के लिए चिन्हित कर उपलब्ध कराया गया है, वह ‘तराई-पूर्वी वन प्रभाग’ के अंतर्गत आने वाली आरक्षित वन भूमि (रिजर्व फॉरेस्ट) है। आरक्षित वन भूमि को गैर-वानिकी कार्यों के लिए हस्तांतरित करना वन संरक्षण अधिनियम, 1980 तथा वन संरक्षण नियम, 2023 का सीधा उल्लंघन है। याचिका में यह भी कहा गया है कि यह कदम राष्ट्रीय वन नीति के सिद्धांतों के भी खिलाफ है।

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“हाईकोर्ट को मैदान में ले जाना पहाड़ी राज्य की मूल अवधारणा और पर्यावरण, दोनों के साथ खिलवाड़ है। आरक्षित वन भूमि को नियमों को ताक पर रखकर देने की प्रक्रिया को अदालत में चुनौती दी गई है।”

 डी.एस. मेहता एवं नवनीश नेगी, अधिवक्ता (याचिकाकर्ता पक्ष)

अब सभी की निगाहें 20 अगस्त को होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ मुख्य अधिवक्ताओं की मौजूदगी में इस मामले पर विस्तृत बहस होगी।

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