अल्मोड़ा स्वतंत्रता का गौरवशाली इतिहास: देश को आजाद कराने में अल्मोड़ा और उसके शूरवीरों का ऐतिहासिक योगदान

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अल्मोड़ा स्वतंत्रता का गौरवशाली इतिहास: देश को आजाद कराने में अल्मोड़ा और उसके शूरवीरों का ऐतिहासिक योगदान

 

 

 

विशेष ऐतिहासिक रिपोर्ट

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल अल्मोड़ा का योगदान स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। यह केवल राजनीतिक आंदोलनों का केंद्र नहीं था, बल्कि यहां के जन-जन ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सत्याग्रह, विद्रोह और शहादत का ऐसा ज्वार उठाया, जिसने अंग्रेजों की नींव हिलाकर रख दी।

 

 

📜 अल्मोड़ा में आजादी का क्रमिक इतिहास और मुख्य घटनाएं
19वीं सदी के अंत से लेकर 1947 में स्वतंत्रता मिलने तक, अल्मोड़ा राष्ट्रीय चेतना और ब्रिटिश-विरोधी आंदोलनों का गढ़ बना रहा:

 

 

 

बौद्धिक क्रांति और ‘अल्मोड़ा अखबार’
1870 – 1871
अल्मोड़ा में ‘डिबेटिंग क्लब’ और उसके बाद 1871 में ‘अल्मोड़ा अखबार’ का प्रकाशन शुरू हुआ। इस समाचार पत्र ने पर्वतीय क्षेत्र में अंग्रेजी शासन के अत्याचारों और कुप्रथाओं के खिलाफ राष्ट्रीय चेतना का बीजारोपण किया।

 

अल्मोड़ा कांग्रेस व कुमाऊं परिषद का गठन
1912 – 1916
1912 में अल्मोड़ा कांग्रेस की स्थापना हुई। इसके बाद 1916 में ‘कुमाऊं परिषद’ का गठन किया गया, जिसने स्थानीय समस्याओं को देश के मुख्य स्वतंत्रता आंदोलन के साथ जोड़ दिया।

 

 

 

कुली बेगार आंदोलन (सरयू का महासंग्राम)
13-14 जनवरी 1921
बद्रीदत्त पांडे और हरगोविंद पंत के नेतृत्व में बागेश्वर के उत्तरायणी मेले में 40,000 से अधिक ग्रामीणों ने भाग लिया। अंग्रेजी हुकूमत के बेगार रजिस्टर सरयू नदी में बहा दिए गए। महात्मा गांधी ने इसे ‘रक्तहीन क्रांति’ की संज्ञा दी थी।

नमक सत्याग्रह और ‘गांधी आश्रम’
1930
शांतिलाल त्रिवेदी ने अल्मोड़ा के चनौदा में गांधी आश्रम की स्थापना की। यह आश्रम सत्याग्रहियों का प्रमुख ठिकाना बन गया, जिससे बौखलाकर अंग्रेजों ने इस पर प्रतिबंध लगाकर कार्यकर्ताओं को जेल भेज दिया।

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देघाट और सालम की जनक्रांति
अगस्त 1942
‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान देघाट (19 अगस्त 1942) में पुलिस गोलीबारी में हरिकृष्ण उप्रेती और हीरामणि बडौला शहीद हुए। 25 अगस्त 1942 को सालम (धामद्यौ) में निहत्थे क्रांतिकारियों पर ब्रिटिश सेना ने गोलियां चलाईं, जिसमें नरसिंह धानक और टीका सिंह कन्याल शहीद हुए।

 

 

सल्ट क्रांति (कुमाऊं का बारडोली)
5 सितंबर 1942
अल्मोड़ा के सल्ट क्षेत्र के खुमाण गांव में स्वतंत्रता सेनानियों की एक विशाल सभा पर ब्रिटिश अधिकारी जॉनसन ने गोलीबारी करवाई। इस घटना में खीमानंद, गंगाराम, चूड़ामणि और बहादुर सिंह शहीद हो गए। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने सल्ट की इस अभूतपूर्व देशभक्ति के कारण इसे ‘कुमाऊं का बारडोली’ कहा था।
🇮🇳 देश को आजाद कराने में अल्मोड़ा के स्वतंत्रता सेनानियों का योगदान
अल्मोड़ा की माटी ने देश को ऐसे नायक दिए जिन्होंने अपने साहस, विचार और कलम से स्वतंत्रता संग्राम की दिशा तय की:

 

 

स्वतंत्रता सेनानी राष्ट्रीय आंदोलन में मुख्य भूमिका

भारत रत्न पंडित गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख नेता। असहयोग, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाई। पंडित नेहरू के साथ कई बार जेल गए और आजादी के बाद उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री व भारत के गृह मंत्री बने।

 

बद्रीदत्त पांडे (‘कुमाऊं केसरी’) ‘अल्मोड़ा अखबार’ और ‘शक्ति’ पत्र के संपादक। कुली बेगार प्रथा के अंत के नायक। जेल में रहते हुए उन्होंने ‘कुमाऊं का इतिहास’ नामक ऐतिहासिक ग्रंथ लिखा।

 

हरगोविंद पंत अल्मोड़ा कांग्रेस के आधारस्तंभ। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में कुमाऊं से गिरफ्तार होने वाले पहले नेता। सामाजिक विषमता खत्म करने के लिए खुद हल चलाकर पुरानी कुरीतियों को तोड़ा। |
विक्टर मोहन जोशी ‘स्वाधीन प्रजा’ समाचार पत्र के माध्यम से आजादी का प्रचार किया। अल्मोड़ा नगर पालिका भवन पर फिरंगियों के सामने भारतीय तिरंगा फहराया और ब्रिटिश पुलिस की बर्बर यातनाएं सही।

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बिश्नी देवी शाह उत्तराखंड की प्रथम महिला स्वतंत्रता सेनानी। 1930 में अल्मोड़ा में महिलाओं का जुलूस निकाला और तिरंगा फहराने पर जेल जाने वाली पहली महिला बनीं। |
राम सिंह ‘आजाद’ और कौमी दल सालम जनक्रांति के मुख्य सूत्रधार, जिन्होंने गुप्त रूप से युवाओं को संगठित कर अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ सशस्त्र व अहिंसक विद्रोह की रणनीति बनाई। |

 

 

अल्मोड़ा जेल: राष्ट्रीय आंदोलनों की साक्षी
अल्मोड़ा की जिला कारागार का देश की आजादी में विशेष महत्व है। यह केवल जेल नहीं थी, बल्कि आजादी के विचारकों की वैचारिक शाला थी:
पंडित जवाहरलाल नेहरू को ब्रिटिश शासन के दौरान चार बार (1934, 1935, 1940 और 1945) इसी जेल में बंद रखा गया।
नेहरू जी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तकों के महत्वपूर्ण अंश अल्मोड़ा जेल के इसी प्रवास के दौरान लिखे थे।
आचार्य नरेंद्र देव, खान अब्दुल गफ्फार खान और गोविंद बल्लभ पंत जैसे दिग्गजों ने भी इस जेल में यातनाएं सहकर देश के स्वाभिमान को बनाए रखा।

 

 

अल्मोड़ा का इतिहास केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। 1921 के कुली बेगार आंदोलन की ‘रक्तहीन क्रांति’ से लेकर 1942 की सल्ट व सालम की शहादतों तक, अल्मोड़ा ने भारत माता के चरणों में अपनी संतानों के रक्त का अर्घ्य दिया। देश की आजादी का सूरज उगाने में अल्मोड़ा के स्वतंत्रता सेनानियों का यह त्याग हमेशा वंदनीय रहेगा।

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