विशेष रिपोर्ट: गांधीवादी मूल्यों और सतत विकास के प्रणेता — कुमार कलानन्द मणि

विशेष रिपोर्ट: गांधीवादी मूल्यों और सतत विकास के प्रणेता — कुमार कलानन्द मणि
पणजी/नई दिल्ली। भारत में गांधीवादी विचारों, ग्रामीण पुनरुद्धार और पर्यावरण संरक्षण की जब भी बात होती है, तो कुमार कलानन्द मणि का नाम अग्रिम पंक्ति में आता है। बिहार आंदोलन से लेकर गोवा की वादियों तक, समाज सेवा और जन-आंदोलनों में उनका योगदान अतुलनीय रहा है।
जेपी आंदोलन से समाज सेवा का सफर
कुमार कलानन्द मणि की वैचारिक यात्रा 1970 के दशक में आचार्य विनोबा भावे के ‘भूदान आंदोलन’ और लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) के ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन से शुरू हुई। छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के माध्यम से उन्होंने सामाजिक असमानता, अशिक्षा और अन्याय के खिलाफ पुरजोर आवाज उठाई और आपातकाल के दौरान कई बार जेल भी गए।
‘पीसफुल सोसाइटी’ की स्थापना और गोवा में कार्य
1980 के दशक के शुरुआती वर्षों में उन्होंने गोवा को अपनी कर्मभूमि बनाया और 1983 में स्वतंत्रता सेनानी माधव बीर व अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर ‘पीसफुल सोसाइटी’ (Peaceful Society) संगठन की नींव रखी।
इस संस्था के माध्यम से उन्होंने:
ग्रामीण स्वावलंबन: स्थानीय संसाधनों के सही उपयोग और कृषि-आधारित आजीविका को बढ़ावा दिया।
महिला सशक्तिकरण: ग्रामीण महिलाओं को स्वरोजगार और सामाजिक निर्णयों में भागीदारी के लिए प्रेरित किया।
जल एवं पर्यावरण संरक्षण: ‘सेव वेस्टर्न घाट मूवमेंट’ (Save Western Ghats Movement) में अग्रणी भूमिका निभाते हुए पश्चिमी घाट की जैव विविधता की रक्षा के लिए अलख जगाई।
एक जीवन, एक संदेश
कुमार कलानन्द मणि जी का मानना है कि वास्तविक विकास वही है जो अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और प्रकृति के अनुकूल हो। आपदा प्रबंधन, शांति स्थापना और सामाजिक समरसता के लिए उनका निरंतर प्रयास आज की नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है।