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सीमांत की शौर्यगाथा: आज़ादी की वेदी पर पिथौरागढ़ के वीरों ने लिखी थी अदम्य साहस की इबारत

 

पिथौरागढ़ : भारत के मानचित्र पर देश की पूर्वी सीमा पर स्थित सीमांत जिला पिथौरागढ़ केवल अपनी नैसर्गिक सुंदरता और सामरिक महत्व के लिए ही नहीं, बल्कि आज़ादी के आंदोलन में अपने अप्रतिम त्याग, बलिदान और शौर्य के लिए जाना जाता है। बीसवीं सदी की शुरुआत से लेकर 1947 तक सोर घाटी, जोहार, अस्कॉट और गंगोलीहाट के बांकुरों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ संघर्ष का परचम बुलंद रखा।

 

 

 

राजनीतिक चेतना और जन-आंदोलन की मशाल

पिथौरागढ़ में आज़ादी की अलख जगाने में प्रयाग दत्त पंत की केंद्रीय भूमिका रही, जिन्हें सोर घाटी में राजनीतिक चेतना का जनक माना जाता है। उन्होंने कुली बेगार प्रथा के खिलाफ उग्र आंदोलनों का नेतृत्व किया। वहीं, 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान खड़क बहादुर सिंह महर ने सीमांत क्षेत्र के युवाओं और ग्रामीणों को एकजुट कर ब्रिटिश हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी।

गांधीवादी पंडित राम दत्त जोशी ने नमक सत्याग्रह और व्यक्तिगत सत्याग्रह के जरिए सत्याग्रहियों की फौज तैयार की, जबकि देव सिंह दानू ने ब्रिटिश जंगलात नीतियों के खिलाफ किसानों और ग्रामीणों को संगठित कर जल, जंगल और जमीन के हक की लड़ाई लड़ी।

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आजाद हिंद फौज में सीमांत के वीरों का शौर्य

पिथौरागढ़ के स्वतंत्रता संग्राम का सबसे स्वर्णिम और गौरवशाली अध्याय नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ‘आज़ाद हिंद फौज’ (INA) से जुड़ा है। जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी ने ‘दिल्ली चलो’ का नारा दिया, तो पिथौरागढ़ के सैकड़ों वीर जवानों ने सिंगापुर, मलय और बर्मा के मोर्चों पर ब्रिटिश सेना के खिलाफ मोर्चा संभाल लिया।

प्रमुख वीरों का अमूल्य योगदान:

 

 

 

कैप्टन दीवान सिंह दानू (सोर घाटी): सिंगापुर मोर्चे पर INA में शामिल होकर बर्मा सीमा पर ब्रिटिश सेना के दांत खट्टे किए।

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कैप्टन पदम सिंह बिष्ट (गंगोलीहाट): पूर्वोत्तर सीमा पर अग्रिम मोर्चे पर लड़ाई लड़ी और भीषण युद्ध के बाद युद्ध बंदी बनाए गए।

शेर सिंह महर (अस्कॉट): बर्मा के जंगलों में अदम्य साहस का परिचय देते हुए आजाद हिंद सरकार के प्रति समर्पित रहे।

गोपाल सिंह मर्तोलिया (जोहार/मुंसियारी): उच्च हिमाचली क्षेत्रों से आकर INA की रसद और खुफिया व्यवस्था को मजबूती प्रदान की।

 

 

 

अमर रहेगा पिथौरागढ़ का योगदान

दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और संसाधनों की कमी के बावजूद पिथौरागढ़ की पावन माटी ने ऐसे नायकों को जन्म दिया जिन्होंने न केवल राजनीतिक आंदोलनों में जेलें काटीं, बल्कि हाथ में हथियार उठाकर आज़ाद हिंद फौज की वर्दी पहन देश को आज़ाद कराने में अपने प्राणों की बाजी लगा दी। आज़ादी के दशकों बाद भी इन वीरों की गाथाएं सीमांत क्षेत्र के हर नागरिक के दिल में राष्ट्रभक्ति का जज्बा पैदा करती हैं।

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