बागेश्वर 1900: तिब्बत व्यापार के स्वर्णिम दौर से लेकर जन-आंदोलन की नींव तक का ऐतिहासिक सफर

 

 

बागेश्वर: बीसवीं सदी की शुरुआत के साथ ही कुमाऊं का प्राचीन धार्मिक नगर बागेश्वर उत्तर भारत के सबसे बड़े व्यापारिक और राजनीतिक केंद्र के रूप में अपनी अमिट पहचान दर्ज करा चुका था। सरयू और गोमती के पावन संगम पर स्थित यह ऐतिहासिक कस्बा न केवल मानसरोवर यात्रा का मुख्य पड़ाव था, बल्कि तिब्बत से होने वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार की सबसे बड़ी मंडी भी बन चुका था।

 

 

 

तिब्बत व्यापार का मुख्य प्रवेश द्वार
सन 1900 के दौर में भोटिया व्यापारियों का कारवां तिब्बत से सुहागा, कस्तूरी, कीमती जड़ी-बूटियां, याक की पूंछ और ऊन लेकर बागेश्वर पहुंचता था। मकर संक्रांति पर लगने वाले प्रसिद्ध उत्तरायणी मेले में देश के मैदानी हिस्सों से आए व्यापारी कपड़े, गुड़ और अनाज के बदले तिब्बती सामानों की खरीद-फरोख्त करते थे। आर्थिक दृष्टि से यह क्षेत्र कुमाऊं का मुख्य वित्तीय केंद्र बना हुआ था।

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ब्रिटिश हुकूमत और बढ़ता असंतोष
अंग्रेजी शासन के दौरान बागेश्वर प्रशासनिक दृष्टिकोण से अल्मोड़ा जिले की अत्यंत महत्वपूर्ण तहसील थी। चाय बागानों के विस्तार और सीमांत क्षेत्रों पर निगरानी के लिए ब्रिटिश अधिकारियों की आवाजाही यहाँ लगातार बनी रहती थी। हालांकि, इसी दौर में ब्रिटिश हुकूमत की शोषणकारी नीति ‘कुली बेगार’ और जबरन श्रम प्रथा के खिलाफ स्थानीय जनमानस में असंतोष की चिनगारी सुलगने लगी थी।

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जन-जागरण की बनी नींव
1900 के दशक में ही उत्तरायणी मेले की पहचान केवल धार्मिक स्नान और व्यापार तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह क्षेत्रीय समस्याओं पर विचार-विमर्श का बड़ा मंच बनने लगा था। बुद्धिजीवियों और स्थानीय सुधारकों द्वारा रोपे गए इसी राजनीतिक चेतना के बीज ने आगे चलकर 1921 में बागेश्वर की धरती से ऐतिहासिक ‘कुली बेगार उन्मूलन आंदोलन’ का जन्म दिया।
धार्मिक आस्था, समृद्ध व्यापार और स्वतंत्रता संग्राम की नींव समेटे वर्ष 1900 का बागेश्वर आज भी उत्तराखंड के स्वाभिमान और स्वर्णिम इतिहास की गवाही देता है।