अल्मोड़ा :-इतिहास व आस्था का केंद्र विमलकोट: 2200 मीटर की ऊंचाई पर ‘न्याय की देवी’ का दरबार, पर बुनियादी सुविधाओं की दरकार

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इतिहास, आस्था और उपेक्षा: 2200 मीटर की ऊंचाई पर ‘न्यायकारी’ विमला देवी का अलौकिक दरबार, पर सुविधाओं की दरकार

 

 

विशेष रिपोर्ट दरवान रावत, धौलछीना (अल्मोड़ा)। उत्तराखंड की सुरम्य वादियों में स्थित प्राचीन कोट (किले) केवल गौरवशाली इतिहास और युद्ध रणनीतियों के गवाह नहीं रहे, बल्कि लोक-आस्था और अध्यात्म के भी महान केंद्र रहे हैं। अल्मोड़ा जिले के भैसियाछाना ब्लॉक स्थित मल्ला लखनपुर पट्टी का विमलकोट इसका जीता-जागता उदाहरण है। कत्यूरी और चंद राजवंशों का गवाह रहा यह ऐतिहासिक व आध्यात्मिक स्थल आज अपनी अलौकिक सुंदरता के बावजूद सरकारी उपेक्षा और बुनियादी सुविधाओं की कमी झेल रहा है।

 

 

 

 

 

2200 मीटर की ऊंचाई पर बना दुर्ग और सामरिक रणनीति

समुद्र तल से लगभग 2200 मीटर (8000 फुट) की ऊंचाई पर दो तरफ से तराशी गई मजबूत प्राकृतिक चट्टानों के बीच बना विमलकोट कत्यूर व चंद काल में सैन्य दृष्टिकोण से बेहद अहम था। पुरातत्वविद चंद्र सिंह चौहान के अध्ययन के अनुसार, चंदवंशी राजा भीष्म चंद (1511-1533 ई.) ने इसे अपना प्रमुख सैन्य अड्डा, निगरानी केंद्र और सूचना केंद्र बनाया था।

 

 

 

प्रहरी आवास व अवशेष: किले के पूर्वी शिखर पर प्रहरियों के आवास बने थे, जबकि पश्चिमी समतल भूभाग पर आज भी तीन प्राचीन भवनों के अवशेष मौजूद हैं।

ऐतिहासिक सुरंग: किले से घाटी में उतरने के लिए एक गुप्त सुरंग थी, जिसका प्रयोग सैनिक दुश्मन से बचाव, नीचे उतरने और पेयजल आपूर्ति के लिए करते थे। हालांकि, सुरक्षा कारणों से आजादी के कुछ वर्षों बाद इसे बंद कर दिया गया।

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फसलों व सीमाओं की निगरानी: ऊंचे शिखर पर बने इस कोट से प्रहरी न केवल दुश्मन सेना की गतिविधियों पर नजर रखते थे, बल्कि निचले भूभाग के उपजाऊ खेतों में उगी फसलों की सुरक्षा भी करते थे।

 

 

 

 

 

ऐसे बनीं ‘न्याय की देवी’

विमलकोट के ठीक सामने ‘पटियारकोट’ (घड्यारकोट) स्थित है, जहाँ चंद शासनकाल व पटियार शासकों के दौर में अदालत बैठती थी। लोकमान्यता है कि न्यायिक प्रक्रिया में खोट आने या अदालत से न्याय न मिलने पर फरियादी विमलकोट पहुँचकर मां विमला देवी के दरबार में गुहार लगाते थे। माता के दरबार से कभी कोई खाली हाथ नहीं लौटा, जिससे मां भगवती के इस रूप को ‘न्यायकारी देवी’ के नाम से ख्याति मिली।

 

 

 

 

राजा भीष्म चंद ने 1515 ई. के आसपास यहाँ भव्य मंदिर बनवाया और पूजन-प्रबंधन के नियम बनाए, जो आज भी कायम हैं। यहाँ बारह महीने नवरात्र जैसा माहौल रहता है। अखंड रामायण, सुंदरकांड, श्रीमद्भागवत कथा के साथ विवाह और जनेऊ जैसे धार्मिक अनुष्ठान यहाँ आयोजित होते हैं।

 

 

 

 

प्राकृतिक सौंदर्य और धार्मिक महात्म्य

बांज, बुरांश, देवदार, काफल और सुरई के घने जंगलों से घिरा यह क्षेत्र प्राकृतिक और धार्मिक पर्यटन का अद्भुत संगम है। पास ही प्रसिद्ध आनंदमयी आश्रम भी है। मंदिर परिसर से नंदा देवी, त्रिशूल, पंचाचूली, नंदा खाट, चौखंभा, नीलकंठ, धौलागिरी, पिंडारी ग्लेशियर जैसी बर्फानी चोटियों के साथ-साथ बिनसर, कसारदेवी और वृद्ध जागेश्वर के विहंगम दर्शन होते हैं।

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शास्त्रों के अनुसार, भगवान भैरव के बिना मां विमला देवी की पूजा अधूरी मानी जाती है (“विमला सा महादेवी जगन्नाथस्तु भैरवः…”)। मंदिर के आगे हनुमान जी और पीछे शिवांश भगवान भैरव विराजमान हैं। यहाँ संतान प्राप्ति के लिए ‘खड़ा दीया’ जलाने की सदियों पुरानी परंपरा है और हर वर्ष विशाल मेले का आयोजन होता है।

 

 

 

बदहाल सड़क और उपेक्षा से थमा पर्यटन

इतने बड़े ऐतिहासिक और प्राकृतिक महत्व के बावजूद विमलकोट मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है। मंदिर तक पहुँचने वाले 3 किलोमीटर लंबे मार्ग पर सालों बाद भी डामरीकरण (पक्की सड़क) नहीं हो सका है। सड़क की खस्ताहाली के कारण यहाँ पर्यटन की अपार संभावनाएँ दम तोड़ रही हैं।क्या कहते हैं स्थानीय लोग:  मंदिर के पुजारी व स्थानीय लोगों की सरकार से माग हैं कि “यदि विमलकोट को जोड़ने वाली सड़क को पक्का कर दिया जाए और बुनियादी नागरिक सुविधाएं विकसित की जाएं, तो यहाँ तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की आवाजाही कई गुना बढ़ सकती है। इससे स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और आजीविका के नए अवसर पैदा होंगे।”

 

 

 

कैसे पहुंचें?

मार्ग: अल्मोड़ा से सेराघाट रोड पर 40 किमी दूर धौलछीना स्थित है।

पैदल यात्रा: धौलछीना से 3 किमी आगे विमलकोट का मुख्य प्रवेश द्वार है, जहाँ से लगभग 1 किमी सीढ़ियों की चढ़ाई तय करके मंदिर के मुख्य शिखर तक पहुँचा जा सकता है।

 

 

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