Uttrakhand News:होमकुंड ही विसर्जित होंगे चौसिंग्या खाड़ू, तय पड़ावों से ही आगे बढ़ेगी नंदा की बड़ी जात
पांच सितंबर से कुरूड़ से बड़ी जात कैलास के लिए निकल पड़ी है। बड़ी जात कुरूड़ के आयोजकों ने पहले 26 पड़ावों वाली बड़ी जात की घोषणा करते हुए कार्यक्रम भी जारी कर दिया था, जो कुरूड़ से निकलने वाली जात के पड़ावों को निर्धारित करता है।
5 सितंबर को कुरूड़ से शुरू हुई यात्रा का 30 सितंबर को सिद्धपीठ देवराड़ा में हवन-यज्ञ के साथ समापन होने का कार्यक्रम तय किया गया था। बाद में कुछ और कार्यक्रम भी जारी किए गए, जिसमें घोषित किया गया कि बड़ी जात वेदनी बुग्याल पड़ाव तक जाएगी, उसके बाद आली बुग्याल होते हुए वापसी के लिए प्रस्थान करेगी। इससे असमंजस की स्थिति पैदा हो गई। 5 सितंबर को यात्रा प्रारंभ हुई है तो यात्रा के साथ दो चौसिंग्या खाड़ू भी चल रहे हैं। स्वाभाविक है, खाड़ू का विसर्जन होमकुंड में ही होगा। इसलिए अब तय माना जा रहा है कि यात्रा पूर्व-घोषित अपने निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार ही चलेगी। कमेटी से जुड़े लोगों ने भी इस बात को दोहराया है।
कुरूड़ में जब 5 सितंबर को यात्रा प्रारंभ हुई, वहां एक-दो दिन पहले से ही बड़ी संख्या में बाहर से लोगों का आना शुरू हो गया। शासन-प्रशासन की तरफ़ से कोई व्यवस्था नहीं हो पाई थी। इसलिए बड़ी जात समिति को उनके रहने-खाने की व्यवस्था करने में पसीने छूट गए। इतनी भीड़ कुरूड़ में कभी नहीं देखी गई।
दरअसल, इस बार मौसम अधिक खराब है, सितंबर तक लगातार बारिश हो रही है। उच्च हिमालयी क्षेत्र में तो हालात और खराब होंगे, कीचड़ से रास्तों की हालत ज़्यादा खराब हो जाएगी। इसलिए शासन-प्रशासन के सहयोग की ज़रूरत पड़ेगी।
नंदा मां, उत्तराखंड में सबकी आराध्य देवी है। जौहार-मुंस्यारी से लेकर उत्तरकाशी-चमोली तक गांव-गांव में मां नंदा की पूजा होती है। सभी जगह नंदा के मंदिर मौजूद हैं, लोग अपने घरों में भी नंदा के मंदिर बनाकर मां को पूजते हैं। इसलिए पूरे उत्तराखंड को जोड़ने में मां नंदा को सबसे मज़बूत कड़ी माना जाता है। सन् 2000 में जब नंदा राजजात के कार्यक्रमों की घोषणा हुई, उसके ठीक बाद उत्तराखंड राज्य की भी केंद्र सरकार ने आधिकारिक घोषणा की थी। इसलिए उत्तराखंड राज्य को नंदा का वरदान कहा जाने लगा। नंदकेशरी में जहां कुमाऊं और गढ़वाल की यात्रा का मिलन होता है, नंदकेशरी के पुल पर बुजुर्गों ने इसकी बाकायदा घोषणा भी की थी। यात्रियों ने हर्षोल्लास के साथ इसे स्वीकार भी किया था।
यह बात शीशे की तरह साफ़ हो गई है कि नंदा की विरासत का कोई विभाजन नहीं हुआ है। कुरूड़ बड़ी जात आयोजन कमेटी ने इसे बड़ी जात नाम दिया है। पड़ावों में यात्रा की देखरेख करने वाली कमेटियों की तरफ़ से साफ़ कहा जा रहा है कि वे कुरूड़ से निकली बड़ी जात का भी स्वागत करेंगे और अगले साल होने वाली राजजात का भी उसी तरह से स्वागत करेंगे।