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Uttrakhand गौरा देवी की राह पर चलीं हिमाद्रि संस्था की युवतियां; पेड़ों से लिपटकर जताया कड़ा विरोध

विकास की बलि चढ़ेंगे 3000 हरे पेड़! ऋषिकेश-देहरादून मार्ग पर फिर जिंदा हुई ‘चिपको आंदोलन’ की याद

ऋषिकेश/देहरादून: ऋषिकेश-देहरादून मुख्य मार्ग को चौड़ा करने के नाम पर पर्यावरण को उजाड़ने की कवायद शुरू हो गई है। बड़कोट वन रेंज के अंतर्गत ‘सात मोड़’ के समीप लगभग 3000 विशालकाय और हरे-भरे पेड़ों को काटे जाने के विरोध में पर्यावरण प्रेमियों का गुस्सा फूट पड़ा है। इस विनाश के खिलाफ ‘हिमाद्रि संस्था’ से जुड़ी युवतियों और युवाओं ने मोर्चा संभाल लिया है। युवतियों ने पेड़ों से लिपटकर उत्तराखंड के ऐतिहासिक ‘चिपको आंदोलन’ की यादें ताजा कर दीं और साफ चेतावनी दी कि विकास के नाम पर प्रकृति का यह कत्लेआम बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
कुल्हाड़ी के आगे ढाल बनीं बेटियां, जन आंदोलन की चेतावनी

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जैसे ही बड़कोट वन रेंज में ऋषिकेश-देहरादून मार्ग पर ‘सात मोड़’ के पास पेड़ों को काटने का काम शुरू हुआ, हिमाद्रि संस्था के कार्यकर्ता भारी संख्या में मौके पर पहुंच गए। पेड़ों को कटता देख आक्रोशित युवतियां पेड़ों से चिपक गईं और वन विभाग व प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारी युवाओं का कहना था कि सड़क चौड़ीकरण जरूरी हो सकता है, लेकिन इसके लिए हजारों साल पुराने विशालकाय वृक्षों की बलि चढ़ाना कहां का न्याय है? युवाओं ने आम जनता से भी इस पर्यावरण विरोधी कदम के खिलाफ एकजुट होकर एक बड़ा जन आंदोलन खड़ा करने की अपील की है।

विजुअल (Visuals For Digital/TV):
ऋषिकेश-देहरादून मार्ग पर ‘सात मोड़’ के पास रोष जताते और नारेबाजी करते युवा।
आंखों में नाराजगी और पर्यावरण बचाने का संकल्प लिए, बड़े-बड़े पेड़ों से कसकर लिपटीं संस्था की युवतियां (चिपको आंदोलन की तर्ज पर)।
पृष्ठभूमि में कटने के लिए चिन्हित किए गए विशालकाय पेड़।

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 “विकास की अंधी दौड़ में हम अपने फेफड़े खुद ही काट रहे हैं। 3000 हरे-भरे और विशालकाय पेड़ों को काटने का मतलब है इस पूरे क्षेत्र के इको-सिस्टम को तबाह करना। हम गौरा देवी की धरती से हैं और अपनी प्राकृतिक विरासत को इस तरह खत्म नहीं होने देंगे। अगर यह कटान तुरंत नहीं रोका गया, तो हमारा यह विरोध एक उग्र राष्ट्रव्यापी आंदोलन का रूप लेगा।”अरुणिमा नौडियाल, सचिव, हिमाद्रि संस्था

सड़कें चौड़ी करने के और भी तकनीकी विकल्प हो सकते हैं, जिससे पेड़ों को कम से कम नुकसान हो। लेकिन प्रशासन सीधे कुल्हाड़ी चलाने का आसान रास्ता चुनता है। आज का युवा जागरूक है, हम पर्यावरण की इस तबाही को मूकदर्शक बनकर नहीं देख सकते। हर नागरिक को इस लड़ाई में आगे आना होगा।”प्रतीक वर्मा सदस्य, हिमाद्रि संस्था

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