विशेष आलेख: नंदादेवी न्यूज़ में गढ़वाल और कुमाऊं की सीमा पर आस्था व शौर्य का प्रतीक — बधाणगढ़ी

विशेष आलेख:नंदादेवी न्यूज़ में गढ़वाल और कुमाऊं की सीमा पर आस्था व शौर्य का प्रतीक — बधाणगढ़ी
उत्तराखंड की हसीन वादियों में बसा ग्वालदम केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि अपने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के लिए भी जाना जाता है। ग्वालदम से करीब 8 किलोमीटर दूर, लगभग 3000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बधाणगढ़ी (बधाण गढ़) गढ़वाल और कुमाऊं के संगम पर स्थित एक ऐसा ऐतिहासिक किला और मंदिर परिसर है, जो सदियों से आस्था, शौर्य और सामरिक रणनीति का केंद्र रहा है।
बधाणगढ़ किले का ऐतिहासिक महत्व: गढ़वाल का अभेद्य दुर्ग
ऐतिहासिक दृष्टि से बधाणगढ़ का स्थान उत्तराखंड के सैन्य इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण है। परमार (पंवार) राजवंश के शासनकाल के दौरान गढ़वाल 52 गढ़ों (सैन्य किलों) में विभाजित था, जिनमें से बधाणगढ़ सबसे प्रमुख, सामरिक और अभेद्य किलों में से एक था।
पहाड़ी की चोटी पर प्राकृतिक सुरक्षा: यह किला एक तीखी और संकरी पहाड़ी की चोटी पर बनाया गया था, जहाँ से चारों दिशाओं (पिंडारी घाटी, थराली, बैजनाथ घाटी और गरुड़) पर पूरी नज़र रखी जा सकती थी। किले की भौगोलिक बनावट ऐसी थी कि दुश्मन के लिए इस पर सीधा हमला करना लगभग असंभव था।
सामरिक सीमा व प्रहरी दुर्ग: कुमाऊं और गढ़वाल की प्राकृतिक सीमा पर स्थित होने के कारण यह दुर्ग पंवार राजाओं के लिए सीमा प्रहरी का काम करता था। यहाँ गढ़वाली राजाओं की सेना की स्थायी टुकड़ी तैनात रहती थी, जो कुमाऊं के चंद राजाओं की हर सैन्य हलचल पर पैनी नज़र रखती थी।
ग्वालदम का ऐतिहासिक युद्ध (1581 ई.): 16वीं शताब्दी में कुमाऊं के चंद राजा रुद्रचंद ने गढ़वाल पर आक्रमण किया था। इस दौरान प्रसिद्ध ‘ग्वालदम का युद्ध’ इसी दुर्ग के निचले क्षेत्रों में लड़ा गया। इस युद्ध में बधाणगढ़ के किलेदार (गढ़पति) और पंवार राजा बलभद्र शाह की सेना ने चंद सेना को परास्त किया था, जिसमें चंद राजा के सेनापति पुरुषोत्तम पंत मारे गए थे।
नंदा देवी का कुमाऊं आगमन: किले पर विजय और अल्मोड़ा स्थानांतरण
माँ नंदा देवी गढ़वाल और कुमाऊं दोनों अंचलों की साझा आराध्य देवी हैं। कुमाऊं में माँ नंदा देवी के आगमन और चंद राजवंश की कुलदेवी बनने का सीधा संबंध इसी बधाणगढ़ किले से जुड़ा है:
राजा बाज बहादुर चंद का आक्रमण: 17वीं शताब्दी (लगभग 1669-1670 ई.) में कुमाऊं के शक्तिशाली चंद राजा बाज बहादुर चंद ने गढ़वाल पर बड़ा सैन्य अभियान चलाया। इस युद्ध में चंद सेना ने बधाणगढ़ किले पर विजय प्राप्त कर ली।
स्वर्ण विग्रह का अल्मोड़ा आगमन: जीत के बाद राजा बाज बहादुर चंद बधाणगढ़ किले के मंदिर में स्थापित माँ नंदा देवी की प्रसिद्ध स्वर्ण प्रतिमा (विग्रह) को बड़े आदर और सम्मान के साथ कुमाऊं की राजधानी अल्मोड़ा ले आए।
अल्मोड़ा में मंदिर निर्माण: इस प्रतिमा को पहले अल्मोड़ा के मल्ला महल (वर्तमान कलेक्ट्रेट परिसर) में स्थापित किया गया। बाद में चंद राजा द्योत चंद ने 17वीं शताब्दी के अंत में अल्मोड़ा में भव्य नंदा देवी मंदिर का निर्माण कराया। ब्रिटिश शासनकाल में कमिश्नर ट्रेल के समय इसे वर्तमान नंदा देवी परिसर में स्थानांतरित किया गया।
इस प्रकार बधाणगढ़ का यह किला कुमाऊं में नंदा देवी की भक्ति परंपरा की ऐतिहासिक शुरुआत का मुख्य साक्षी रहा है।
धार्मिक व आध्यात्मिक महत्त्व: माँ शक्ति और कालभैरव का धाम
किला परिसर के भीतर स्थित मंदिर संपूर्ण सीमावर्ती क्षेत्र के लिए अगाध श्रद्धा का केंद्र है।
माँ दुर्गा का अष्टभुजा रूप: पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित मंदिर में माँ भगवती (दुर्गा) ‘अष्टभुजा’ रूप में विराजमान हैं। स्थानीय मान्यता है कि युद्ध काल में यही देवी पंवार शासकों और सैनिकों की रक्षा करती थीं।
कालभैरव का पहरा: मंदिर परिसर में भगवान कालभैरव की भी पूजा की जाती है, जिन्हें इस दुर्ग और आसपास के क्षेत्र का ‘क्षेत्रपाल’ (रक्षक) माना जाता है।
नंदा देवी राजजात से संबंध: बधाणगढ़ी का संबंध प्रसिद्ध श्री नंदा देवी राजजात यात्रा से भी गहरा है। पूरे बधाण परगने को माँ नंदा देवी का मायका क्षेत्र माना जाता है, जिससे यहाँ नवरंग और नवरात्रि में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है।
सांस्कृतिक संगम और पर्यटन की संभावनाएं
बधाणगढ़ किले के अवशेषों और मंदिर परिसर से हिमालय की पंचाचूली, नंदा देवी, त्रिशूल और मृगथूनी जैसी बर्फ से ढकी चोटियों का विहंगम नजारा दिखता है।
आज यह दुर्ग स्थल न केवल इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए रुचि का केंद्र है, बल्कि गढ़वाल और कुमाऊं की साझी विरासत का प्रतीक भी है। ग्वालदम से बांज, बुरांश और देवदार के जंगलों से होकर बधाणगढ़ी तक जाने वाला ट्रैक पर्यटकों और ट्रेकर्स के लिए एक अद्भुत अनुभव प्रदान करता है।