Almora News:अल्मोड़ा मार्ग का एक ओझल रहस्य: क्या आप जानते हैं जसूली देवी की ऐतिहासिक धर्मशाला का सच?

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अल्मोड़ा। उत्तराखंड की सुरम्य देवभूमि अपने आंचल में ऐसे अनेक अनसुलझे रहस्य और गौरवशाली इतिहास समेटे हुए है, जिनसे आज की पीढ़ी लगभग अनजान है। ऐसा ही एक स्वर्णिम और जनसेवा से भरा पन्ना अल्मोड़ा-हल्द्वानी मार्ग पर स्थित जसूली देवी की धर्मशाला’ का है। 19वीं शताब्दी में निर्मित यह धर्मशाला कभी कुमाऊं के दुर्गम रास्तों पर गुजरने वाले तीर्थयात्रियों और राहगीरों के लिए एकमात्र सुरक्षित आश्रय हुआ करती थी, जो आज इतिहास के पन्नों में कहीं खो सी गई है।

🌸​कौन थीं दानवीर जसुली धपोला (देवी)?

​अल्मोड़ा और पिथोरागढ़ क्षेत्र के लोक इतिहास के अनुसार, 19वीं सदी के उत्तरार्ध में दानवीर जसूली धपोला (जिन्हें स्थानीय लोग आदर से जसूली देवी कहते हैं) एक समृद्ध व्यापारी घराने से ताल्लुक रखती थीं। उनके पास अपार धन-संपदा थी, लेकिन पुत्र-शोक और सांसारिक दुखों से विरक्त होकर उन्होंने अपना पूरा जीवन जनकल्याण और देव-सेवा में समर्पित कर दिया।

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​उस दौर में कैलाश मानसरोवर, बद्रीनाथ और केदारनाथ की पैदल यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं को रुकने और भोजन की भारी समस्याओं का सामना करना पड़ता था। इस कष्ट को देखते हुए जसूली देवी ने कुमाऊं से लेकर गढ़वाल तक के प्रमुख पैदल मार्गों पर दर्जनों पक्की धर्मशालाओं का निर्माण करवाया।

🌸​अल्मोड़ा मार्ग पर बनी धर्मशाला की खासियत

​अल्मोड़ा के निकट मार्ग पर बनी यह धर्मशाला स्थापत्य कला और दूरदर्शिता का एक अनूठा उदाहरण है:

🌸​विश्राम और सुरक्षा: तराशे गए पत्थरों और पारंपरिक पहाड़ी नक्काशी से बनी इस विशाल इमारत में दर्जनों कमरे और यात्रियों के रुकने की उत्तम व्यवस्था थी।

🌸​मुफ्त रसद व पानी: कहा जाता है कि जसौली देवी ने इन धर्मशालाओं में ठहरने वाले यात्रियों के लिए मुफ्त राशन और पेयजल की व्यवस्था भी की थी।

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🌸​यात्रियों के लिए संजीवनी: तत्कालीन ब्रिटिश शासनकाल में जब यातायात के साधन नगण्य थे, तब यह धर्मशाला अल्मोड़ा की दुर्गम पहाड़ियों में यात्रियों के लिए एक बड़ा सहारा साबित होती थी।

🌸​आज उपेक्षा के आंसू बहाती ऐतिहासिक विरासत

​कभी जहां सैकड़ों यात्रियों की चहल-पहल रहती थी, आज वही ऐतिहासिक धर्मशाला देखरेख के अभाव में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच चुकी है। आधुनिक सड़कों के निर्माण और पुरानी पैदल पगडंडियों के छूट जाने के कारण यह ऐतिहासिक धरोहर मुख्य धारा से कटकर झाड़ियों और भूल-भुलैया में छिप गई है।

​स्थानीय इतिहासकारों और ग्रामीणों का मानना है कि यदि शासन-प्रशासन इस स्थल का जीर्णोद्धार करे और इसे पर्यटन/धरोहर परिपथ से जोड़े, तो यह न केवल दानवीर जसौली देवी के त्याग और सेवाभाव को सच्ची श्रद्धांजलि होगी, बल्कि अल्मोड़ा के समृद्ध इतिहास को उजागर करने में भी मील का पत्थर साबित होगा।

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