Uttrakhand News:’धामी मॉडल’ से बदली आपदा प्रबंधन की तस्वीर: धाराली-थराली से जोशीमठ तक राहत के साथ दीर्घकालिक पुनर्वास पर जोर

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धाराली और थराली में आई भीषण फ्लैश फ्लड और मलबे के बहाव को बीते समय बीत चुका है। उस दौर में पहली प्राथमिकता मानव जीवन की सुरक्षा और ठप पड़ी नागरिक सुविधाओं को बहाल करने की थी।

राज्य सरकार की इस पहल ने केवल तात्कालिक राहत कार्यों तक सीमित रहने के बजाय पीड़ितों के दीर्घकालिक पुनर्वास और उनके जीवन को पटरी पर लाने का काम किया है। उत्तराखंड सरकार का यह प्रयास अब ‘धामी मॉडल’ के रूप में पहचाना जा रहा है, जहाँ आपदा के बाद महज अस्थायी मदद नहीं दी जाती, बल्कि ढांचागत विकास को भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप ढला जाता है।

🌸सुरक्षित हिमालयी ढांचे का निर्माण

पुनर्निर्माण के इस दौर में भावी प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने की रणनीति भी शामिल है। राज्य में आधुनिक तकनीक, मौसम ट्रैकिंग, सैटेलाइट मैपिंग और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों पर आधारित आपदा प्रबंधन ढांचा लागू किया गया है।

पहाड़ी ढालों का स्थिरीकरण, भूस्खलन रोधी दीवारें, नदियों के तटबंधों का सुदृढ़ीकरण और इंजीनियरिंग मानकों में बदलाव कर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि निर्मित इंफ्रास्ट्रक्चर भविष्य के प्रवाह को सहन कर सके।

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🌸रेस्क्यू से बुनियादी ढांचे की बहाली

आपदा के तुरंत बाद राज्य आपदा मोचन बल (SDRF), राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF), भारतीय सेना और स्थानीय प्रशासन को एक साथ धरातल पर उतारा गया। प्रभावित क्षेत्रों में चिकित्सा सेवा और रसद पहुँचाने के साथ-साथ बुनियादी सुविधाओं को दोबारा शुरू करने का काम शुरू किया गया। धाराली, थराली, हर्षिल और भटवाड़ी जैसे सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कें, बिजली और पेयजल लाइनों का ध्वस्त होना किसी भी समुदाय के लिए जीवन रेखा के कट जाने जैसा है। पहाड़ों में कटी हुई सड़क का मतलब अस्पतालों, स्कूलों और बाजारों तक पहुंच का रुकना होता है। राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, पूरे क्षेत्र में राहत, पुनर्वास और विकास कार्यों के लिए 33 करोड़ रुपये से अधिक की राशि स्वीकृत की गई।

🌸पुनर्वास में आजीविका बहाली पर विशेष जोर

पुनर्वास प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा आजीविका को दोबारा शुरू करना रहा है। आवंटित राशि में से 16 करोड़ रुपये से अधिक पशुपालन, सिंचाई, उद्यान, कृषि, ग्रामीण विकास, ऊर्जा, पर्यटन और लोक निर्माण जैसे विभागों के माध्यम से इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में लगाए गए।

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वहीं 17 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि सीधे प्रभावित परिवारों के खातों में वित्तीय सहायता के रूप में हस्तांतरित की गई। पहाड़ी अर्थव्यवस्था के मूल आधार यानी सेब के बगीचों की क्षतिपूर्ति, भेड़-बकरी पालन के लिए प्रोत्साहन, बीज व पौधों का वितरण और कृषि योग्य भूमि के सुधार पर विशेष ध्यान दिया गया।

🌸जोशीमठ संकट में भी दिखा यही रुख

पुनर्वास के इस प्रशासनिक रुख का उदाहरण जोशीमठ भू-धंसाव संकट के दौरान भी देखा गया था। प्रभावित परिवारों को होटल, गेस्ट हाउस और सुरक्षित आश्रयों में स्थानांतरित करने के साथ-साथ नगर को डेंजर, बफर और सेफ जोन में विभाजित किया गया। विस्थापित परिवारों को 4,000 रुपये का मासिक किराया भत्ता, 1.5 लाख रुपये की अंतरिम सहायता, पानी-बिजली के बिलों में छूट और तीन अलग-अलग पुनर्वास विकल्प उपलब्ध कराए गए। इसरो (ISRO), आईआईटी रुड़की और जीएसआई (GSI) जैसी वैज्ञानिक संस्थाओं की रिपोर्ट के आधार पर 1,658 करोड़ रुपये से अधिक की वृहद पुनर्निर्माण योजना तैयार की गई।

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