उत्तराखंड 11 हज़ार फीट की ऊँचाई पर रचा गया लोक-संस्कृति का रंग, दयारा बुग्याल में धूमधाम से मनाया गया पारंपरिक ‘अंढूड़ी उत्सव’
उत्तराखंड 11 हज़ार फीट की ऊँचाई पर रचा गया लोक-संस्कृति का रंग, दयारा बुग्याल में धूमधाम से मनाया गया पारंपरिक ‘अंढूड़ी उत्सव’
विशेष रिपोर्ट | उत्तरकाशी
उत्तरकाशी जनपद में समुद्र तल से लगभग 11 हजार फीट की विशाल ऊँचाई पर स्थित विश्व प्रसिद्ध दयारा बुग्याल एक बार फिर अपनी समृद्ध लोक-परंपरा और अनूठे उल्लास का साक्षी बना। प्रकृति के विशाल आँगन में आयोजित प्रसिद्ध पारंपरिक ‘अंढूड़ी उत्सव’ (बटर फेस्टिवल) में इस वर्ष भी संस्कृति, आस्था और आनंद का अद्भुत संगम देखने को मिला।
पहाड़ी संस्कृति के इस अलौकिक पर्व में भाग लेने के लिए उत्तरकाशी के रैथल सहित आसपास के तमाम सीमांत गाँवों के ग्रामीण, देश-विदेश से पहुँचे सैकड़ों पर्यटक और स्थानीय लोग एक साथ इस अद्भुत अनुभव के भागीदार बने। हरे-भरे मखमली बुग्यालों के बीच दूध, दही और मक्खन की होली के रंगों में पूरा दयारा बुग्याल सराबोर नज़र आया।
दूध-मक्खन से खेली गई अनूठी होली, प्रकृति का आभार जताया
पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, ‘अंढूड़ी उत्सव’ केवल एक सांस्कृतिक आयोजन ही नहीं, बल्कि प्रकृति और पशुधन (भगवान श्रीकृष्ण/सोमेश्वर देवता) के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का एक अनूठा माध्यम है। मानसून के मौसम में जब ग्रामीण अपने मवेशियों को चुगाने के लिए उच्च हिमालयी बुग्यालों में जाते हैं, तो वहाँ मिलने वाले समृद्ध दुग्ध-उत्पाद (दूध, दही, मक्खन) का पहला अंश देवता को अर्पित किया जाता है।
इसी आभार स्वरूप ग्रामीण एक-दूसरे पर मक्खन और छाछ लगाकर खुशी मनाते हैं। इस वर्ष भी लोक-वाद्यों (ढोल-दमाऊ) की मधुर थाप पर ग्रामीणों और पर्यटकों ने पारंपरिक ‘रासो’ और ‘तांदी’ नृत्य प्रस्तुत किया, जिससे पूरा बुग्याल गूँज उठा।
देश-विदेश से पहुँचे पर्यटकों के लिए बना यादगार पल
दूध और मक्खन की इस अनूठी होली ने यहाँ पहुँचे विदेशी और राष्ट्रीय पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। होली के रंगों के बजाय शुद्ध मक्खन की होली खेलना पर्यटकों के लिए एक बिल्कुल नया और दिव्य अनुभव रहा।“11 हजार फीट की ऊँचाई पर इस तरह की अनूठी परंपरा और ग्रामीणों का आतिथ्य सचमुच अतुलनीय है। यह उत्सव प्रकृति और इंसानों के पवित्र रिश्ते की जीवंत मिसाल है।” — उत्सव में पहुँचे एक पर्यटक का अनुभव
हमारी धरोहर, हमारा अभिमान
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और दयारा पर्यटन विकास समिति का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक करने और पहले खेली जाने वाली गोबर की होली की जगह अब दूध-मक्खन की होली को बढ़ावा दिया गया है, ताकि बुग्यालों की नाजुक पारिस्थितिकी (Ecology) को कोई नुकसान न पहुँचे।
दयारा का बटर फेस्टिवल अब न केवल उत्तराखंड की लोक-संस्कृति का प्रतीक बन चुका है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साहसिक और सांस्कृतिक पर्यटन (Cultural Tourism) का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभर रहा है।