उत्तराखंड में संस्कृति और आस्था का संगम: बूढ़ा केदार में संपन्न हुआ पौराणिक ‘भेरू कु तमासु’ महोत्सव
संस्कृति और आस्था का संगम: बूढ़ा केदार में संपन्न हुआ पौराणिक ‘भेरू कु तमासु’ महोत्सव
विशेष रिपोर्ट
टिहरी गढ़वाल। देवभूमि उत्तराखंड के प्राकृतिक सौंदर्य और अटूट धार्मिक मान्यताओं के केंद्र बूढ़ा केदार क्षेत्र में आयोजित पारंपरिक भेड़ परिक्रमा महोत्सव ‘भेरू कु तमासु’ कल हर्षोल्लास और भक्तिमय माहौल के साथ संपन्न हो गया। बालगंगा और धर्मगंगा के पवित्र संगम तट पर स्थित बूढ़ा केदार मंदिर परिसर में आयोजित इस वार्षिक लोक उत्सव में हिमालयी पशुपालक संस्कृति, जन-आस्था और सदियों पुरानी परंपराओं का अद्भुत संगम देखने को मिला।
क्या है ‘भेरू कु तमासु’?
‘भेरू कु तमासु’ स्थानीय भाषा का शब्द है, जिसका सीधा अर्थ ‘भेड़ों का उत्सव या कौतुक’ है।
पशुपालक संस्कृति का प्रतीक: यह उत्सव मुख्यतः गढ़वाल हिमालय के उच्च पर्वतीय बुग्यालों (घास के मैदानों) से लौटने वाले भेड़ पालकों (अनवाल) के जीवन और उनकी जीविका से जुड़ा है।
भगवान शिव के प्रति आभार: भीषण ठंड और बर्फबारी शुरू होने से पहले जब अनवाल अपने पशुधन (भेड़-बकरियों) को उच्च हिमालयी चारागाहों से सुरक्षित निचले इलाकों में लाते हैं, तब वे भगवान बूढ़ा केदार (शिव) का धन्यवाद करने मंदिर परिसर पहुँचते हैं।
सजी-धजी भेड़ों की परिक्रमा: ढोल-दमाऊ और रणसिंगे की गूंज के बीच रंग-बिरंगे धागों और घंटीमालाओं से सजाई गई भेड़ों को मंदिर परिसर के चारों ओर घुमाया जाता है। यह परिक्रमा पशुओं की निरोगी काया और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती है।
पौराणिक महत्व और परंपराएं
मान्यता है कि महाभारत युद्ध के उपरांत पांडव जब गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति के लिए भगवान शिव की खोज में हिमालय की ओर बढ़े, तो शिव जी ने वृद्ध रूप धारण कर उन्हें इसी स्थल पर दर्शन दिए थे। इसी पौराणिक कथा के कारण इस धाम को ‘बूढ़ा केदार’ कहा जाता है।
महोत्सव के दौरान स्थानीय देवी-देवताओं की डोलियों के आगमन और देव पश्वाओं के आशीर्वाद ने पूरे माहौल को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। ग्रामीणों ने देव-डोलियों का भव्य स्वागत किया और आगामी कृषि व पशुपालन चक्र के लिए क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की।
धरोहर के संरक्षण की आवश्यकता
समय के साथ हो रहे पलायन और बदलते आजीविका के साधनों के बीच यह महोत्सव गढ़वाल की आत्मनिर्भर पशुपालक संस्कृति को जीवंत रखने का काम करता है। स्थानीय निवासियों और संस्कृति प्रेमियों का कहना है कि ऐसे पारंपरिक मेलों को राजकीय संरक्षण मिलना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी मूल जड़ों, लोककला और प्रकृति-संस्कृति से जुड़ी रहे।