‘सपनों की घाटी’ में जिंदगी दांव पर: उत्तरकाशी के हरकी दून में मानव श्रृंखला बनाकर उफनते गदेरे पार करने को मजबूर ग्रामीण पूरी खबर कमेंट बॉक्स पर
सपनों की घाटी’ में जिंदगी दांव पर: उत्तरकाशी के हरकी दून में मानव श्रृंखला बनाकर उफनते गदेरे पार करने को मजबूर ग्रामीण*
**उत्तरकाशी।** देश-विदेश के पर्यटको लों में ‘सपनों की घाटी’ के रूप में जगह बनाने वाली हरकी दून घाटी आज विकास की हकीकत बयां कर रही है। सीमांत मोरी विकासखंड के अंतर्गत आने वाले सांकरी, सौड़, ओसला, पवाणी, ढाटमेर, पुर्ती और गंगाड़ गांवों में रहने वाले हजारों ग्रामीणों के लिए मानसून का मौसम किसी सजा से कम नहीं है। सोशल मीडिया की रील्स से इतर, यहाँ के लोग हर दिन असली जिंदगी में ‘खतरों के खिलाड़ी’ बनने को मजबूर हैं। एक छोटी सी चूक यहाँ जिंदगी को मौत के मुहाने पर खड़ा कर सकती है।
**सड़कें बदहाल, उफनते नाले बने काल**
बरसात शुरू होते ही सांकरी-हरकी दून मोटर मार्ग पूरी तरह से मलबे और उफनते नदी-नालों की भेंट चढ़ चुका है। जगह-जगह मार्ग क्षतिग्रस्त होने से कई गांवों का सड़क संपर्क जिला मुख्यालय और मुख्य बाजारों से पूरी तरह कट गया है। सबसे खौफनाक तस्वीरें तब सामने आती हैं, जब ग्रामीणों को अपनी दैनिक जरूरतों और राशन-पानी के लिए उफनते गदेरों (नदी-नालों) को पार करना पड़ता है। तेज बहाव के बीच ग्रामीण एक-दूसरे का हाथ पकड़कर, मानव श्रृंखला (ह्यूमन चेन) बनाकर जान जोखिम में डालते हैं।
**रास्ते में ही दम तोड़ रहे हैं मरीज**
क्षेत्र में बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं का हाल बेहद दयनीय है। ग्रामीणों का दर्द है कि यदि कोई गंभीर रूप से बीमार हो जाए या किसी गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना हो, तो समय पर चिकित्सा सुविधा मिलना लगभग असंभव है। कई बार ऐसी दर्दनाक स्थितियां भी बनी हैं जब डंडी-कंडी के सहारे अस्पताल ले जाते समय मरीज ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया।
**पर्यटन का चमकता चेहरा, सुविधाओं का अंधेरा**
विडंबना यह है कि यह पूरा क्षेत्र ट्रेकिंग और प्राकृतिक संदुरता के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात है। हर साल हजारों देशी-विदेशी पर्यटक यहाँ आते हैं। इसके बावजूद स्थानीय जनता आज भी सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और संचार (नेटवर्क) जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रही है। जर्जर सड़कें, सिर पर खड़ी दरकती चट्टानें और नीचे गहरी खाई के बीच का यह सफर ग्रामीणों के लिए हर दिन का खौफ बन चुका है।
**स्थानीय निवासियों का दर्द **
* “हर साल बरसात में हमारे गांवों का संपर्क कट जाता है। उफनते नालों को पार करने में डर लगता है, लेकिन घर में राशन लाना है तो जान हथेली पर रखनी ही पड़ेगी।”
* **बाइट 2 (महिला निवासी):** “सबसे ज्यादा दिक्कत बीमारी के वक्त होती है। नेटवर्क रहता नहीं कि एम्बुलेंस बुला सकें, और रास्ते इतने खराब हैं कि कोई गाड़ी आने को तैयार नहीं होती।”
“देश-विदेश के लोग यहाँ घूमने आते हैं, सरकार पर्यटन से कमाती है। लेकिन हमारी सुध लेने वाला कोई नहीं है। हमें आज भी आदिम युग की तरह पैदल और जान जोखिम में डालकर चलना पड़ रहा है।”
“नेताओं को सिर्फ चुनाव के वक्त वोट चाहिए होते हैं। सालों से हम यही बदहाली देख रहे हैं। जब तक पक्की सड़कें और पुल नहीं बनेंगे, हमारी मुसीबतें कम नहीं होंगी।”