उत्तराखंड का हिमालय का महाकुम्भ सिद्धपीठ कुरुड़ से मां नंदा की बड़ी जात (राजजात) यात्रा शुरू, विशेष विधि-विधान से कैलाश विदा हुईं देव डोलियां
उत्तराखंड का हिमालय का महाकुम्भ सिद्धपीठ कुरुड़ से मां नंदा की बड़ी जात (राजजात) यात्रा शुरू, विशेष विधि-विधान से कैलाश विदा हुईं देव डोलियां
चमोली/नंदानगर: उत्तराखंड की प्रसिद्ध आस्था का प्रतीक ‘मां नंदा बड़ी जात/राजजात यात्रा’ 5 सितंबर से विधिवत शुरू हो गई है। 12 वर्षों के पारंपरिक चक्र को निभाते हुए चमोली जिले के प्रसिद्ध सिद्धपीठ कुरुड़ से मां नंदा की उत्सव डोलियों को उनके ससुराल कैलाश के लिए रवाना किया गया। इस अवसर पर कुरुड़ परिसर में भव्य धार्मिक अनुष्ठान और भावुक विदाई समारोह संपन्न हुआ।
दिव्य पूजा-अर्चना और विशेष विधि-विधान यात्रा के शुभारंभ से पूर्व कुरुड़ मंदिर में सुबह से ही कई धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए गए:
स्नान एवं श्रृंगार: ब्रह्म मुहूर्त में मां नंदा की मूर्तियों को पवित्र गंगाजल और जड़ी-बूटियों से स्नान कराकर विशेष आभूषणों व वस्त्रों से अलंकृत किया गया।
वैदिक हवन व आह्वान: गौड़ ब्राह्मणों और मुख्य पुजारियों ने संकल्प पूजा तथा हवन कर मां नंदा, भगवान शिव और लाटू देवता से यात्रा के सफल व निर्विघ्न समापन का आशीर्वाद मांगा।
खाडू व छंतोलियों का पूजन: यात्रा का मुख्य आकर्षण रहे चार सींगों वाले पवित्र ‘चौसिंग्या खाडू’ का रोली-अक्षत से पूजार्जन किया गया। साथ ही मां की देव छंतोलियों और डोलियों को भी पूजकर प्रस्थान के लिए तैयार किया गया।
ध्याणियों की अश्रुपूरित विदाई: क्षेत्र की बेटियों (ध्याणियों) ने पारंपरिक ‘मंगल गीत’ गाते हुए मां को पिठैं (तिलक) और अक्षत भेंट किए। ठीक दोपहर 3 बजे प्रस्थान आरती और ढोल-दमाऊं की दिव्य गूंज के बीच डोलियों ने कैलाश की ओर रुख किया।
295 किमी लंबा दुर्गम पड़ाव यह पैदल यात्रा लगभग 25 से 26 दिनों में 295 किलोमीटर का सफर तय करेगी:
गांव पड़ाव: कुरुड़ से शुरू होकर यह यात्रा 12 सितंबर को रामणी और 15 सितंबर को वाण स्थित लाटू देवता के मंदिर पहुंचेगी।
उच्च हिमालयी क्षेत्र: वाण से आगे बढ़कर यात्रा 18 सितंबर को प्रसिद्ध ‘वेदनी बुग्याल’ पहुंचेगी, जहां मुख्य जात और पूजा संपन्न होगी। इसके बाद रूपकुंड और ज्योंरागली होते हुए यात्रा 20 सितंबर को होमकुंड पहुंचेगी, जहां चौसिंग्या खाडू को कैलाश की ओर विदा किया जाएगा।
देश-विदेश से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं के लिए स्थानीय प्रशासन और कुरुड़ मंदिर समिति द्वारा सुरक्षा, स्वास्थ्य और विश्राम के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।