देवभूमि में सावन की बयार: ‘नये डांगर’ की पहली जातर का रहस्य; जानिए झांकर सैम दरबार में नए पश्वा को लाने की प्राचीन परंपरा और धार्मिक इतिहास
# देवभूमि में सावन की बयार: जागेश्वर धाम के रक्षक झांकर सैम देवता का पौराणिक इतिहास और आस्था का समागम
अल्मोड़ा।पवित्र सावन मास में देवभूमि उत्तराखंड के शिवालयों में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ रहा है। जागेश्वर धाम से लगभग 3 से 4 किलोमीटर दक्षिण में घने देवदार के वनों (दारुकावन) के बीच स्थित **झांकर सैम (सैम राजा) मंदिर में सावन के महीने में विशेष धार्मिक अनुष्ठान और भक्तों का तांता लगा हुआ है। कुमाऊँ संस्कृति में ‘न्याय के देवता’ और जागेश्वर क्षेत्र के ‘क्षेत्रपाल’ के रूप में पूजे जाने वाले झांकर सैम देवता का इतिहास जितना प्राचीन है, उतना ही रहस्यमयी और अलौकिक भी।
झांकर सैम का ऐतिहासिक व पौराणिक संदर्भ
स्कंद पुराण के ‘मानसखंड’ में झांकर सैम क्षेत्र की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। मान्यता है कि झांकर सैम भगवान शिव के ही सात्विक स्वयंभू रूप हैं:
सप्तर्षियों की कथा: पौराणिक कथाओं के अनुसार, जागेश्वर में ‘तरुण जागेश्वर’ के रूप में स्थापित होने से पूर्व भगवान शिव ने इसी दारुकावन में घोर तपस्या की थी। इस दौरान उनकी अलौकिक आभा से आकर्षित होकर सप्तर्षियों की पत्नियां मुग्ध हो गई थीं। इस पर क्रुद्ध होकर सप्तर्षियों ने शिवजी को श्राप दिया, जिसके बाद वे तरुण जागेश्वर के रूप में स्थापित हुए और झांकर सैम क्षेत्र में ‘सैम देवता’ (जटाधारी शिव) के रूप में विराजमान रहे।
किरात अवतार व महाभारत काल: महाभारत कालीन कथाओं के अनुसार, जब धनुर्धर अर्जुन को अपने कौशल का अहंकार हो गया था, तब भगवान शिव ने किरात रूप धारण कर इसी हिमालयी क्षेत्र में अर्जुन का अभिमान तोड़ा था।
स्वयंभू लिंग और ‘झांकर सेम’ नामकरण: कुमाऊंनी भाषा में ‘सेम’ शब्द का अर्थ स्वयंभू (अपने आप प्रकट होने वाला) होता है। मान्यता है कि देवदार के घने जंगल (झंकार/झाड़ी) में एक दरांती लगने पर वृक्ष से रक्त और तत्पश्चात् दूध की धारा बहने लगी थी, जो एक लिंग में समाहित हो गई। तभी से इन्हें ‘झांकर सेम’ कहा जाने लगा।
सावन मास में झांकर सैम का धार्मिक महत्व
सावन का महीना भगवान शिव और उनके अवतारों की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। झांकर सैम दरबार में सावन के दौरान धार्मिक अनुष्ठान चरम पर होते हैं:
अखंड ज्योति व सात्विक भोग: झांकर सैम मंदिर में वर्ष भर अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है। सावन के महीने में श्रद्धालु विशेष रूप से मक्खन (नोनी), दाल-भात और रोट का सात्विक भोग लगाते हैं।
जागर की परंपरा: सावन की रातों में मंदिर प्रांगण में पौराणिक ‘जागर’ अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। वाद्य यंत्रों (ढोल-दमाऊ) की थाप पर सैम देवता के ‘डंगरिया’ (पश्वा) अवतरित होकर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं और उनके कष्टों का निवारण करते हैं।
न्याय की गुहार: कुमाऊँ क्षेत्र में लोक देवता गोलज्यू की भांति झांकर सैम को भी मामा स्वरूप और परम न्यायकारी माना जाता है। सावन में दूर-दराज से श्रद्धालु अपनी पीड़ा और मनोकामनाएं लेकर इनके दरबार में पहुंचते हैं।
विशेष मान्यता: कुमाऊंनी लोक परंपरा में झांकर सैम को लोक देवताओं का “मामा” कहा जाता है। माना जाता है कि सावन में झांकर सैम के दर्शन मात्र से असाध्य रोगों से मुक्ति और जीवन में सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
येभी है धार्मिक महत्व
देवभूमि में सावन की बयार: ‘मामा’ झांकर सैम के दरबार पहुंचती हैं कुमाऊँ भर से जातरे; जानिए इस प्राचीन परंपरा का पौराणिक इतिहास
पवित्र सावन मास में देवभूमि के शिवालयों और सिद्ध पीठों में भक्तों का हुजूम उमड़ रहा है। जागेश्वर धाम से महज़ 3 किलोमीटर दूर घने देवदार के वनों (दारुकावन) के बीच स्थित **झांकर सैम (सैम राजा) मंदिर** में इन दिनों आस्था का अनोखा समागम देखने को मिल रहा है। सावन के महीने में अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत और नैनीताल सहित पूरे कुमाऊँ मंडल के गाँव-गाँव से श्रद्धालुओं की सामूहिक ‘जातर’ (धार्मिक पदयात्राएं) झांकर सैम के दरबार में पहुँच रही हैं।
‘जातर’ का ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संदर्भ
कुमाऊंनी संस्कृति में ‘जातर’ केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि संपूर्ण ग्रामीण समुदाय का आस्था, लोक-संगीत और कृतज्ञता के भाव के साथ देव-दरबार में उपस्थिति दर्ज कराने का ऐतिहासिक जरिया है।
लोक देवताओं के ‘मामा’ का निवास:पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, झांकर सैम देवता को कुमाऊँ के अनेक लोक देवताओं—विशेष रूप से न्याय के देवता
न्यायकारी गोलज्यू (गोलू देवता)—का मामा माना जाता है। इसी नाते पूरे कुमाऊँ मंडल में जब भी किसी गाँव में सुख-समृद्धि, फसल की अच्छी पैदावार या पारिवारिक कल्याण के लिए अनुष्ठान होता है, तो सावन में ‘मामा’ झांकर सैम के दर्शन हेतु जातर ले जाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
पारंपरिक छोलिया और ढोल-दमाऊ की गूंज: जातर के रूप में जब ग्रामीण पैदल या वाहनों के जत्थों में निकलते हैं, तो उनके साथ लाल-पीले देव-ध्वज (निशान), ढोल-दमाऊ, रणसिंगा और पारंपरिक ‘छोलिया’ नर्तक चलते हैं। पूरा मार्ग “जय सैम ज्यू!” के जयकारों से गुंजायमान हो उठता है।
झांकर सैम का पौराणिक इतिहास
स्कंद पुराण के मानसखंड में वर्णित झांकर सैम क्षेत्र की महिमा भगवान शिव के सात्विक व स्वयंभू रूप से जुड़ी है:
सप्तर्षियों की कथा व क्षेत्रपाल रूप:जागेश्वर में ‘तरुण जागेश्वर’ के रूप में स्थापित होने से पूर्व भगवान शिव ने इसी दारुकावन में तपस्या की थी। सप्तर्षियों के श्राप और घटनाक्रम के पश्चात् भगवान शिव यहाँ ‘सैम देवता’ (जटाधारी शिव) के रूप में विराजमान रहे और इस पूरे जागेश्वर क्षेत्र के ‘क्षेत्रपाल’ (रक्षक) कहलाए।
अर्जुन का अहंकार भंजन (किरात अवतार): महाभारत काल में जब धनुर्धर अर्जुन को अपने कौशल का अभिमान हो गया था, तब भगवान शिव ने इसी हिमालयी क्षेत्र में किरात रूप धारण कर अर्जुन का अहंकार तोड़ा था।
स्वयंभू लिंग और नामाकरण: कुमाऊंनी में ‘सेम’ का अर्थ स्वयंभू होता है। घने जंगल (झंकार) में देवदार वृक्ष के समीप दरांती लगने से बही रक्त व दूध की धारा का एक लिंग में समाहित होना ही इस स्थान के ‘झांकर सेम/सैम’ नामकरण का आधार बना।
सावन में जातर, जागर और धार्मिक अनुष्ठान
सावन के पवित्र महीने में झांकर सैम के दरबार में जातर के पहुँचने पर विशेष अनुष्ठान संपन्न होते हैं:
रोट और नोनी (मक्खन) का सात्विक भोग: जातर के साथ आए श्रद्धालु झांकर सैम को शुद्ध घी-आटे से निर्मित ‘रोट’, ताजा मक्खन (नोनी) और दाल-भात का भोग अर्पित करते हैं।
रात भर चलने वाली ‘जागर’: जातर के मंदिर पहुँचने पर रात्रि विश्राम के दौरान ‘जागर’ बैठाई जाती है। जगरिया के गायन और ढोल की थाप पर सैम देवता के ‘डंगरिया’ (पश्वा) अवतरित होते हैं। मान्यता है कि छिपलाकोट के युद्ध के दौरान पाँव में चोट लगने के कारण सैम देवता का डंगरिया एक पाँव पर नाचता है और भक्तों को आशीर्वाद देकर उनके कष्ट हरता है।
सामूहिक न्याय व मन्नत की पूर्ति: जो लोग गोलज्यू या गाँव के मंदिरों में मनोकामना मांगते हैं, वे अपनी मन्नत पूरी होने पर सावन की जातर में झांकर सैम के दरबार में आकर कढ़ाई (भोग) चढ़ाते हैं।
विशेष मान्यता: कुमाऊँ की लोक-परंपरा में माना जाता है कि सावन के दौरान जो गाँव या श्रद्धालु झांकर सैम के दरबार में जातर लेकर पहुँचता है, उसके गाँव और परिवार पर पूरे वर्ष कोई दैवीय आपदा या संकट नहीं आता। यही कारण है कि सदियों से चली आ रही यह ‘जातर’ परंपरा आज भी अटूट श्रद्धा के साथ जीवंत है।
# देवभूमि में सावन की बयार: ‘नये डांगर’ की पहली जातर का रहस्य; जानिए झांकर सैम दरबार में नए पश्वा को लाने की प्राचीन परंपरा और धार्मिक इतिहास
पवित्र सावन मास में कुमाऊँ के प्रसिद्ध सिद्ध पीठ झांकर सैम (सैम राजा) मंदिर** में श्रद्धालुओं और जातरो (धार्मिक पदयात्राओं) का तांता लगा हुआ है। जागेश्वर धाम से महज़ 3 किलोमीटर दूर दारुकावन के शांत देवदार वनों के बीच बसे इस धाम में इन दिनों एक बेहद दुर्लभ और महत्वपूर्ण परंपरा देखने को मिल रही है—नये डांगर’ (नए पश्वा या ध्याणी) को झांकर सैम के दरबार में लाना। कुमाऊँ की लोक-संस्कृति में जब भी किसी गाँव या परिवार में नए व्यक्ति पर देवता अवतरित होते हैं, तो सावन के महीने में उन्हें झांकर सैम के सम्मुख लाना अनिवार्य माना जाता है।
‘नया डांगर’ (पश्वा) क्या है और इसे झांकर सैम क्यों लाया जाता है?
कुमाऊंनी लोक-भाषा में जब किसी व्यक्ति (पुरुष या महिला) के शरीर में पहली बार कोई देव-शक्ति (गोलज्यू, हरज्यू, गंगनाथ आदि) अवतरित होती है, तो उस नए माध्यम या देव-वाहक को ‘नया डांगर’ या ‘नया पश्वा’ कहा जाता है।
नये डांगर को झांकर सैम के दरबार में लाने के पीछे गहरे धार्मिक और आध्यात्मिक कारण हैं:
‘मामा’ से अनुमति और पुष्टि (सत्यापन):पौराणिक परंपरा के अनुसार झांकर सैम को कुमाऊँ के लगभग सभी लोक-देवताओं का “मामा” और मुख्य “क्षेत्रपाल” (संरक्षक) माना जाता है। इसलिए, जब भी किसी नए व्यक्ति पर कोई लोक-देवता प्रकट होते हैं, तो सबसे पहले ‘मामा’ झांकर सैम के दरबार में आकर उस देव-शक्ति की पुष्टि कराई जाती है।
बंधन मुक्ति और शक्ति का संतुलन: ऐसा माना जाता है कि शुरुआत में जब नया डांगर अवतरित होता है, तो देव-शक्ति का वेग बहुत तीव्र और अनियंत्रित होता है। झांकर सैम के प्रांगण में आने से उस नए डांगर का ‘बंधन’ खोला जाता है ताकि देव-शक्ति शांत, सात्विक और जन-कल्याणकारी रूप में कार्य कर सके।
‘परचा’ (सिद्धता) देना: झांकर सैम के प्रांगण में जागर और ढोल-दमाऊ की थाप पर नए डांगर की परीक्षा होती है। यहाँ ‘मामा’ सैम देवता के आशीर्वाद से ही नए डांगर को समाज में देव-वाणी (भविष्यवाणी) करने और दुखों का निवारण करने की आधिकारिक ‘मान्यता’ प्राप्त होती है।
🚩 कुमाऊँ भर से उमड़ रही हैं ‘जातरे’
सावन के महीने में अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत और नैनीताल के दूर-दराज़ गाँवों से लाल-पीले निशान (ध्वज), छोलिया नर्तकों और ढोल-दमाऊ के साथ ‘जातर’ झांकर सैम धाम पहुँच रही हैं।
मामा के प्रति सम्मान: क्योंकि झांकर सैम सभी लोक देवताओं के मामा हैं, इसलिए गाँव के किसी भी अनुष्ठान या नए डांगर के प्रकटीकरण के बाद सावन की जातर में मामा के दर्शन करना अनिवार्य धार्मिक शिष्टाचार माना जाता है।
एक पाँव पर नृत्य का रहस्य: जागर के दौरान जब नए डांगर के साथ झांकर सैम के अपने पश्वा अवतरित होते हैं, तो वे एक पाँव पर नृत्य करते हैं। लोक-कथाओं के अनुसार, छिपलाकोट के युद्ध के दौरान सैम देवता के पाँव में चोट लग गई थी, इसीलिए उनका पश्वा एक पैर से झूमते हुए नए डांगर को आशीर्वाद देता है।
झांकर सैम का पौराणिक इतिहास
स्कंद पुराण के ‘मानसखंड’के अनुसार, दारुकावन का यह क्षेत्र अत्यंत पवित्र और दिव्य है:
क्षेत्रपाल और स्वयंभू रूप: जागेश्वर में शिवजी के ‘तरुण जागेश्वर’ रूप में स्थापित होने से पूर्व, भगवान शिव इसी वन में ‘सैम देवता’ (जटाधारी शिव) के रूप में विराजमान रहे। कुमाऊंनी में ‘सेम’ का अर्थ ‘स्वयंभू’ (स्वतः प्रकट) होता है।
किरात अवतार: महाभारत काल में अर्जुन के धनुर्विद्या के अहंकार को तोड़ने के लिए भगवान शिव ने इसी क्षेत्र में किरात रूप धारण किया था।
विशेष मान्यता: कुमाऊंनी जनमानस में यह दृढ़ विश्वास है कि झांकर सैम की अनुमति और आशीर्वाद के बिना कोई भी नया डांगर (पश्वा) पूर्ण रूप से सिद्ध नहीं हो सकता। सावन में ‘मामा’ सैम देवता के दरबार में हाजिरी लगाने से नए डांगर का देवत्व निखरता है और संपूर्ण गाँव दैवीय बाधाओं से मुक्त होकर सुख-समृद्धि प्राप्त करता है।