उत्तराखंड में हर वर्ष मानसून एक ही सवाल खड़ा करता है, क्या सड़कें और पुल केवल सामान्य मौसम के लिए बनाए जा रहे हैं या ये मौसम की नई चुनौतियों का सामना भी कर पाएंगे?

लोक निर्माण विभाग के मास्टर प्लान के अनुसार अब विभाग सिर्फ सड़कें नहीं बना रहा, बल्कि ऐसी सड़कें और पुल तैयार कर रहा है जो भूस्खलन, अतिवृष्टि और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के बीच भी लंबे समय तक सुरक्षित रहें।

आपदा-रोधी तकनीकों के प्रयोग को प्राथमिकता दी जा रही है। भविष्य की परियोजनाओं में सुरक्षित डिजाइन, वैज्ञानिक सर्वे के उपयोग से आधारभूत ढांचे को अधिक टिकाऊ और सुरक्षित बनाया जा रहा है।

🌸संभावित खतरों का होगा आकलन

लोनिवि का मानना है कि अब जरूरत जोखिम आधारित योजना बनाने की है। सड़क या पुल बनने के बाद नुकसान होने पर सुधार करने के बजाय निर्माण से पहले ही संभावित खतरों का आकलन किया जाए। भविष्य की परियोजनाओं में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, वर्षा के पैटर्न, नदी प्रवाह और भूस्खलन की आशंकाओं को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जाए।

साथ ही, सड़कों को आपदा प्रबंधन का हिस्सा बनाया जाए। सीमांत क्षेत्रों, चारधाम मार्गों और प्रमुख पर्यटन स्थलों के लिए ऐसा नेटवर्क विकसित हो, जिसमें एक मार्ग के बाधित होने पर वैकल्पिक संपर्क तुरंत उपलब्ध हो सके। शहरों और पहाड़ों के लिए अलग-अलग निर्माण मानक बनें, ताकि भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप विकास हो। विभाग ने अपने मास्टर प्लान में इन सभी बिंदुओं को महत्व दिया है।

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लोनिवि. के मुख्य अभियंता राजेश कुमार कहते हैं, आने वाले वर्षों में उत्तराखंड की सबसे बड़ी चुनौती नई सड़कें बनाना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना होगी जो आपदा के समय भी जीवन, अर्थव्यवस्था और संपर्क को सुरक्षित रख सके। यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाते हुए दीर्घकालिक योजना पर काम हुआ तो उत्तराखंड देश के लिए आपदा-रोधी आधारभूत ढांचे का माडल बन सकता है।

🌸क्या करें सड़क बनाने से पहले?

हर सड़क परियोजना से पहले विस्तृत भू-वैज्ञानिक जांच, जल निकासी का वैज्ञानिक अध्ययन और ढलानों की स्थिरता का परीक्षण अनिवार्य किया जाए। सड़क का अलाइनमेंट ऐसा चुना जाए, जहां भूस्खलन और नदी कटाव का खतरा कम हो। परियोजनाओं में निर्माण के साथ-साथ अगले 30-40 वर्षों के संभावित जलवायु प्रभाव का भी आकलन शामिल किया जाए।

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🌸नई तकनीक बचाएगी नुकसान

ड्रोन सर्वे, जीआईएस मैपिंग, सैटेलाइट डाटा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित विश्लेषण से भूस्खलन संभावित क्षेत्रों की पहले ही पहचान की जा सकती है। संवेदनशील ढलानों पर सेंसर लगाकर जमीन की हलचल की निगरानी होगी तो समय रहते यातायात रोका जा सकेगा। इससे जान-माल के नुकसान में कमी आएगी और मरम्मत पर होने वाला खर्च भी घटेगा।

🌸चारधाम और पर्यटन के लिए बन नया माडल

चारधाम यात्रा मार्गों पर पार्किंग हब, शटल सेवा, डिजिटल ट्रैफिक सूचना, आपातकालीन निकासी मार्ग और हेलिपैड का नेटवर्क विकसित किया जाए। यात्रा सीजन में भीड़ के अनुसार वाहनों का चरणबद्ध संचालन हो और किसी मार्ग के बंद होने पर तुरंत वैकल्पिक रूट सक्रिय किया जाए। इससे यात्रियों के साथ स्थानीय लोगों को भी राहत मिलेगी।

🌸पहाड़ों को बचाने वाले प्राकृतिक उपाय अपनाएं

हर समस्या का समाधान कंक्रीट नहीं है। जहां संभव हो वहां स्थानीय घास और गहरी जड़ों वाले पौधों का रोपण, वर्षा जल का नियंत्रित निकास, ढलानों का हरित संरक्षण और प्राकृतिक जलधाराओं का संरक्षण अधिक टिकाऊ समाधान साबित हो सकता है। इससे मिट्टी का कटाव कम होगा और भूस्खलन की आशंका भी घटेगी।

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