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उत्तराखंड सरकार ने देहरादून जिले के भनियावाला-जॉली ग्रांट-ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन सड़क परियोजना के लिए प्रस्तावित पेड़ों की कटाई पर फिलहाल रोक लगा दी है. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने यह फैसला स्थानीय लोगों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और नागरिक संगठनों के लगातार विरोध के बाद लिया है.

सरकार का कहना है कि अब सभी पक्षों से दोबारा बातचीत की जाएगी और सहमति बनने तक पेड़ों की कटाई नहीं होगी.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि उत्तराखंड की प्राकृतिक विरासत, जनता की भावनाएं और राज्य का विकास—तीनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं. उन्होंने अधिकारियों को स्थानीय निवासियों, जनप्रतिनिधियों, पर्यावरण विशेषज्ञों और अन्य संबंधित पक्षों के साथ नए सिरे से बातचीत शुरू करने के निर्देश दिए हैं. उन्होंने यह भी कहा कि आगे की हर कार्रवाई उत्तराखंड हाईकोर्ट के निर्देशों का पूरा सम्मान करते हुए की जाएगी.

हालांकि, आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि केवल अस्थायी रोक पर्याप्त नहीं है. सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटीज़ (एसडीसी) के संस्थापक अनुप नौटियाल ने कहा कि सरकार को साफ़ तौर पर घोषणा करनी चाहिए कि वह इस परियोजना से स्थायी रूप से पीछे हट रही है. उनका कहना है कि यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों का आंदोलन है और उत्तराखंड के गठन के बाद शायद पहली बार कोई पर्यावरण आंदोलन इतनी निरंतरता के साथ चल रहा है.

🌸आखिर विवाद किस बात पर है?

डाउन टू अर्थ के अनुसार, राष्ट्रीय राजमार्ग-7 पर बनने वाली भनियावाला-जॉली ग्रांट-ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन परियोजना लगभग 20 किलोमीटर लंबी है. इसे हाइब्रिड एन्युटी मॉडल के तहत करीब 743 करोड़ रुपये की लागत से बनाया जा रहा है.

परियोजना के लिए कुल 4,369 पेड़ों पर असर पड़ने की बात कही गई है. इनमें 754 पेड़ों को दूसरी जगह स्थानांतरित (ट्रांसप्लांट) करने और 3,605 पेड़ों को काटने का प्रस्ताव है. शुरुआती रिपोर्टों में लगभग 3,000 पेड़ों की कटाई का उल्लेख किया गया था, लेकिन परियोजना के विस्तृत दस्तावेज़ों में यह संख्या अधिक बताई गई है.

राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) का कहना है कि मौजूदा दो लेन सड़क पर रोज़ करीब 18,456 वाहन चलते हैं और चारधाम यात्रा, पर्यटन तथा जॉली ग्रांट हवाई अड्डे की बढ़ती आवाजाही को देखते हुए सड़क का चौड़ीकरण आवश्यक हो गया है. प्राधिकरण के अनुसार, मौजूदा सड़क पर तीखे मोड़, घना जंगल और भारी वाहनों की आवाजाही के कारण जाम और दुर्घटनाएं आम हैं.

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🌸अदालत में भी जारी है मामला

डाउन टू अर्थ के मुताबिक, पर्यावरण कार्यकर्ता रीनू पॉल ने इस परियोजना के खिलाफ जनहित याचिका दायर की थी. उन्होंने हाथी कॉरिडोर और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं.

इस वर्ष जनवरी में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा था कि इस मामले से जुड़े कई महत्वपूर्ण प्रश्न पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, इसलिए सभी पक्ष सर्वोच्च अदालत के फैसले का इंतजार करें.

बाद में एनएचएआई की ओर से दायर स्पष्टीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मार्च में लगाया गया अंतरिम स्थगन आदेश आगे नहीं बढ़ाया गया था. यानी पेड़ों की कटाई पर रोक संबंधी कोई प्रभावी न्यायिक आदेश मौजूद नहीं था. अदालत ने यह भी कहा कि यदि वन विभाग अनुमति नहीं देता है तो यह अलग प्रशासनिक विषय है और एनएचएआई उसके खिलाफ अलग कानूनी कदम उठा सकता है.

रीनू पॉल का आरोप है कि एनएचएआई ने अदालत के आदेश की अपनी सुविधानुसार व्याख्या करते हुए पेड़ों की कटाई शुरू कर दी. उन्होंने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका भी दायर की है, जिस पर 20 या 21 जुलाई को सुनवाई होने की उम्मीद है.

🌸पेड़ों को बचाने के लिए सड़कों पर उतरे लोग

पिछले कुछ दिनों से स्थानीय लोग और पर्यावरण कार्यकर्ता बड़ी संख्या में ‘सात मोड़’ इलाके में जुट रहे थे. कई लोग पेड़ों से लिपटकर और चेनसॉ मशीनों के सामने खड़े होकर कटाई रोकने की कोशिश कर रहे थे.

15 जुलाई को प्रदर्शनकारियों ने हरियाली और प्रकृति के पर्व हरेला को भी विरोध के रूप में मनाया. आंदोलन में शामिल बबीता नाम की एक महिला अपनी ढाई साल की बेटी को भी साथ लेकर पहुंचीं. उन्होंने कहा कि साल के एक बड़े पेड़ को तैयार होने में सौ-दो सौ साल लग जाते हैं, लेकिन उसे काटने में आधा घंटा भी नहीं लगता. वह चाहती हैं कि उनकी बेटी अपने अधिकारों और पर्यावरण की रक्षा करना सीखे.

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🌸पहले भी असफल रहा है पेड़ स्थानांतरण

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पेड़ों को दूसरी जगह लगाने (ट्रांसप्लांट) का उत्तराखंड का अनुभव अच्छा नहीं रहा है.

डाउन टू अर्थ के अनुसार, 2022 में सहस्त्रधारा रोड चौड़ीकरण के दौरान 2,200 से अधिक पेड़ काटे गए थे और 900 से अधिक पेड़ों को दूसरी जगह लगाया गया था. लेकिन इनमें अधिकांश पेड़ बच नहीं सके. देहरादून के राजीव गांधी क्रिकेट स्टेडियम के सामने जिस स्थान पर इन्हें लगाया गया था, उसे अब स्थानीय लोग ‘पेड़ों का कब्रिस्तान’ कहने लगे हैं, क्योंकि वहां अधिकांश पेड़ सूख चुके हैं.

🌸25 वर्षों में कितना जंगल गया?

आरटीआई के आधार पर अनुप नौटियाल का दावा है कि उत्तराखंड बनने के बाद पिछले 25 वर्षों में सड़क, खनन और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए 46,000 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र विकास कार्यों के लिए हस्तांतरित किया जा चुका है. यह औसतन प्रतिदिन लगभग पांच हेक्टेयर जंगल के बराबर है.

उनके अनुसार, राज्य के कुल क्षेत्रफल का केवल लगभग छह प्रतिशत हिस्सा देहरादून जिले में है, लेकिन विकास परियोजनाओं के लिए हस्तांतरित कुल वन क्षेत्र का करीब 47 प्रतिशत अकेले इसी जिले में रहा है.

🌸राहुल गांधी की मुलाकात के बाद तेज हुई सियासत

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मुख्यमंत्री का यह फैसला उस समय आया जब एक दिन पहले कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने देहरादून दौरे के दौरान आंदोलनकारियों से मुलाकात की थी. राहुल गांधी ने प्रदर्शनकारियों को आश्वासन दिया था कि वह इस मुद्दे को संसद में उठाएंगे.

कांग्रेस का दावा है कि सरकार ने जनता के दबाव और राहुल गांधी की मुलाकात के बाद जल्दबाजी में पेड़ों की कटाई रोकने का फैसला लिया. हालांकि सरकार का कहना है कि उसका निर्णय संवाद, सहमति और व्यापक जनहित को ध्यान में रखकर लिया गया है.

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