उत्तराखण्ड में रक्षाबंधन की अनूठी परम्परा :- शंकर दत्त पाण्डेय
उत्तराखण्ड में रक्षाबंधन की अनूठी परम्परा
शंकर दत्त पाण्डेय
रक्षाबंधन भारत का एक प्रमुख, पावन और सांस्कृतिक पर्व है। यह त्योहार भाई-बहन के अटूट प्रेम, स्नेह, विश्वास और जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व प्रत्येक वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन पूरे भारत में बड़े उत्साह, श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। रक्षाबंधन केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह परिवार, सामाजिक एकता और मानवीय मूल्यों को मजबूत करने वाला पर्व भी है।
“रक्षाबंधन” शब्द दो शब्दों से मिलकर बना अर्थात सुरक्षा और बंधन अर्थात संबंध या बंधन। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर रंग-बिरंगी राखी बाँधती है, उसके माथे पर तिलक लगाती है, आरती उतारती है और उसकी लंबी आयु, सुख, समृद्धि तथा उज्ज्वल भविष्य की कामना करती है। बदले में भाई अपनी बहन की रक्षा करने, उसका सम्मान करने और हर परिस्थिति में उसके साथ खड़े रहने का वचन देता है। भाई अपनी बहन को उपहार देकर अपना स्नेह भी व्यक्त करता है।
रक्षाबंधन से अनेक पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। महाभारत के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण की उँगली से रक्त बहने लगा, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उँगली पर बाँध दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रेम और स्नेह का सम्मान करते हुए द्रौपदी की रक्षा का वचन दिया। एक अन्य प्रसिद्ध ऐतिहासिक कथा रानी कर्णावती और मुगल सम्राट हुमायूँ की है। कहा जाता है कि रानी कर्णावती ने अपनी रक्षा के लिए हुमायूँ को राखी भेजी थी, जिसे स्वीकार कर उसने उनकी सहायता करने का निर्णय लिया। ये कथाएँ इस पर्व के महत्व और रक्षा के भाव को दर्शाती हैं।
यह पर्व भाद्र पद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। भारतवर्ष में श्रावणी या रक्षाबन्धन के रूप में इस पर्व को मनाया जाता है इस दिन नूतन यज्ञोपवित (जनेऊ) धारण किया जाता है इसलिए पूर्णिमायुक्त इस पर्व को कुमाऊ में जनेऊ पन्यू भी कहते है। वेद ही हमारे भारतीय संस्कृति के मूलग्रन्थ है। अतः इस माह में यजुर्वेदि लोग वेदाध्ययन आरम्भ करते है जो ज्योतिषय मान्यतानुसार भी भद्रा रहित उपाक्रम व स्वाध्याय के लिए भी उत्तम माना जाता है। उपाक्रम में नूतन यज्ञोपवित धारण करने के विधान है। ऋषि पूजन व तर्पण करके नया यज्ञोपवित धारण करना इस पर्व का विशेष महत्व है। प्राचीनकाल में ग्रामीण क्षेत्रों में ऋषि तर्पण का सामूहिक आयोजन किया जाता था जहाँ गाँव के सभी लोग एकत्रित होकर पूरे विधि विधान व अनुष्ठान कर जनेऊ धारण करते थे। ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषकर ब्राहमण लोग 03 माह पूर्व से जनेऊ बनाना शुरू कर देते है। जनेऊ बनाने में तागे को पूरना व ग्रन्थ पाड़ने का कार्य व्रत धारण कर किया जाता है इसके बाद ही भोजन किया जाता है। यद्यपि श्रावणी उपाक्रम की प्राचीन प्रथा लुप्त सी हो रही है फिर भी संस्कृति प्रेमी नदी व धारे पर जाकर इस कार्य को जीवन्त रखने का प्रयास कर रहे है। प्राचीन काल में जो धागा पूरा हुआ होता था उसी धागे की राखी पहनी जाती थी लेकिन वर्तमान में आधुनिक तरीके से जो राखियों बनायी जाती है उसका प्रचलन ज्यादा हो गया है। प्राचीन परम्परा के अनुसार घर में जब भी जो नया कार्य होता है उस समय नूतन यज्ञोपवित बदलने की परम्परा है।
यज्ञोपवित के तीन सूत्र ज्ञान, कर्म व उपासना का संकेत करते हुए देव, पितृ व ऋषि ऋण के मुक्त हेतु कर्तव्यबोध कराते है। यज्ञोपवित निर्माण का भी एक विशिष्ट विज्ञान है इसके तीन सूत्र (त्रिपली) त्रिदेव ब्रहा, विष्णु, महेश त्रिगुण (सत, रज, तम) सहित देव, ऋषि व पितृ तीन प्रकार के मुक्ति का संदेश देते है। यज्ञोपवित धारण करने का भी मंत्र है।
सर्वप्रथम तीन बार आचमन कर चौथे आचमन में पानी हाथ में लेकर जमीन में गिराया जाता है उसके लिए मंत्र
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात । आयुष्यमग्यं प्रतिमुच्चशुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ।।
पुराने जनेऊ को बदलने का यह मंत्र है।
एतावदिदिद्दनपर्यन्तं ब्रह्मत्वं धारितं मया। जीर्णतत्वात् त्वत् परित्यागो, गच्छ सूत्र यथासुखम् ।।
यज्ञोपवित सूत्र. ही हमें द्विजत्व प्रदान करता है उसके बिना हम यज्ञ के अधिकारी नहीं हो सकते है। हमारी संस्कृति, संस्कार, विचार व आचरण ही ब्राहमत्व प्रदान कर सकते है। यज्ञोपवित हमारी संस्कृति की पहचान, स्वाध्याय एवं कर्तव्यबोध का संवाहक सूत्र है सभी सनातन धर्मालम्बियों को इसे धारण कर गौरव होना चाहिए। इस पर्व को हमारे उत्तराखण्ड में विशेष रूप से मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई के घर आकर उसके हाथ में रक्षा बाधती है और कही-कही भाई भी बहन के घर जाकर अपने हाथ में राखी बधवाता है। इस परम्परा को हमने जीवन्त रखने के लिए अपने आगे आने वाली पीढ़ी को इसके बारे में जानकारी देनी होगी। साथ ही इस पर्व के महत्व को समझाना होगा। कुमाऊ मण्डल में जनपद चम्पावत के मॉ बाराही देवी मन्दिर में इस दिन बग्वाल मेले का आयोजन विशेष रूप से किया जाता है। पूर्व में यहाँ पर पत्थरों से बग्वाल खेली जाती थी लेकिन अब वहाँ पर फलों से बग्वाल खेली जा रही है। लाखों की संख्या में यहाँ पर पर्यटक और श्रद्वालु आकर इस बग्वाल मेले का आनन्द लेत है। सरकारों को इस तरह के पर्वों के संरक्षण व संवर्द्धन की ओर विशेष ध्यान देना होगा साथ ही प्रदेश में जहाँ पर भी संस्कृत विद्यालय है वहाँ पर विशेष रूप से विद्यार्थियों को इस पर्व के बारे में विशेष जानकारी देकर पुरातन परम्परा को जीवंत बनाये रखने का प्रयास करना होगा तभी इस तरह के पर्व धूमधाम से मनाये जा सकते है।
आज के समय में रक्षाबंधन का स्वरूप और भी व्यापक हो गया है। यह पर्व केवल सगे भाई-बहनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि चचेरे, ममेरे, फुफेरे भाई-बहनों, मित्रों तथा सामाजिक संबंधों में भी प्रेम और विश्वास का प्रतीक बन गया है। कई स्थानों पर बहनें सैनिकों, पुलिसकर्मियों और समाज की सुरक्षा में लगे लोगों को भी राखी बाँधकर उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करती हैं। इससे राष्ट्रीय एकता, भाईचारे और सामाजिक सद्भाव की भावना को बल मिलता है।
वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण का महत्व भी बढ़ गया है। इसलिए हमें प्लास्टिक या कृत्रिम सामग्री से बनी राखियों के स्थान पर सूती धागों, कपड़े, बीज या प्राकृतिक सामग्री से बनी पर्यावरण-अनुकूल राखियों का उपयोग करना चाहिए। साथ ही, अनावश्यक खर्च और दिखावे से बचते हुए इस पर्व को सादगी, प्रेम और आत्मीयता के साथ मनाना चाहिए।
उपसंहार-रक्षाबंधन केवल राखी बाँधने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह प्रेम, विश्वास, सम्मान, त्याग और जिम्मेदारी का उत्सव है। यह हमें अपने परिवार और समाज में स्नेह, सहयोग, एकता तथा मानवीय मूल्यों को बनाए रखने की प्रेरणा देता है। हमें इस पावन पर्व की भावना को अपने दैनिक जीवन में अपनाकर रिश्तों को और अधिक मजबूत बनाना चाहिए। यही रक्षाबंधन का सच्चा संदेश है।