प्रोजेक्ट टाइगर के 50 वर्ष: लुप्तप्राय होने की कगार से ‘राष्ट्रीय पशु’ बनने तक बाघों की स्वर्णिम वापसी
प्रोजेक्ट टाइगर के 50 वर्ष: लुप्तप्राय होने की कगार से ‘राष्ट्रीय पशु’ बनने तक बाघों की स्वर्णिम वापसी
एक दूरदर्शी पहल, जिसने बदल दी भारतीय वन्यजीवों की तस्वीर भारत में एक दौर ऐसा भी था जब अंधाधुंध शिकार और सिकुड़ते जंगलों के कारण बाघों का अस्तित्व गंभीर संकट में आ गया था। लेकिन समय रहते भारत सरकार ने इस चुनौती को स्वीकार किया और प्रकृति संरक्षण के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा।1972 (वन्यजीव संरक्षण अधिनियम): बाघों और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए कड़े कानूनी नियम बनाए गए।
1973 (प्रोजेक्ट टाइगर): देश में बाघों की संख्या बढ़ाने और उनके प्राकृतिक आवासों (Habitats) को सुरक्षित करने के लिए ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ लॉन्च किया गया।
राष्ट्रीय पशु का दर्जा: वर्ष 1973 में ही जन-जागरूकता फैलाने और बाघ संरक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाने के उद्देश्य से बाघ को शेर के स्थान पर भारत का ‘राष्ट्रीय पशु’ घोषित किया गया।
सरकार की इस दूरदर्शी सोच और ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के कड़े प्रयासों का ही परिणाम है कि आज भारत दुनिया में बाघों की सबसे बड़ी आबादी वाला देश बन चुका है। जो बाघ कभी विलुप्त होने की कगार पर थे, आज देश के दर्जनों टाइगर रिजर्व्स में शान से दहाड़ रहे हैं। यह सफलता न केवल बाघों के लिए, बल्कि हमारे पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के लिए एक महान उपलब्धि है!
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