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क्रांति की माटी चम्पावत: 1857 के ‘क्रांतिवीर’ कालू माहरा से लेकर INA के वीरों तक, आजादी का गौरवशाली इतिहास

 

 

 

 

अल्मोड़ा। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के पन्नों में उत्तराखंड की पावन भूमि चम्पावत का योगदान स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। 1857 के प्रथम स्वाधीनता समर से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक, इस सीमांत जिले के वीरों ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी।

 

 

 

1857 का शंखनाद और कालू माहरा का गुप्त संगठन उत्तराखंड में आजादी की पहली चिंगारी चम्पावत के विशंग (पाटी) क्षेत्र से ही सुलगी थी। विशंग के अमर सेनानी कालू सिंह माहरा को उत्तराखंड के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी होने का गौरव प्राप्त है। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ ‘क्रांतिवीर’ नाम से एक गुप्त संगठन तैयार किया और लोहाघाट स्थित अंग्रेज छावनी में बगावत का बिगुल फूंक दिया था। इस क्रांति में आनंद सिंह फर्त्याल और बिशन सिंह करायात जैसे वीरों ने अपने प्राणों की आहुति दी।

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सत्याग्रह से लेकर आजाद हिंद फौज तक महात्मा गांधी और पंडित गोविंद बल्लभ पंत के आह्वान पर कुली-बेगार प्रथा के विरोध से लेकर सविनय अवज्ञा आंदोलन तक, चम्पावत के सूखीढांग, खेतीखान और टनकपुर क्षेत्रों से दर्जनों सत्याग्रहियों ने जेल की यातनाएं सही। वहीं, जनकांडे (पाटी) के गुमान सिंह जैसे शूरवीरों ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिंद फौज’ (INA) में शामिल होकर सीमा पर सशस्त्र क्रांति का परचम लहराया।

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चम्पावत की यह पावन धरा न केवल चंद राजाओं की ऐतिहासिक राजधानी रही है, बल्कि भारत माता को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने वाली क्रांति की संवाहक भी रही है। आज भी इन वीरों की गाथाएं आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रसेवा और स्वाभिमान की प्रेरणा दे रही हैं।

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