Uttrakhand News:सातूं-आठूं पर्व: बिरुड़ा पूजन के साथ स्थापित हुए गौरा-महेश, भक्तिमय हुआ कुमाऊं
कुमाऊं में लोकपर्व ‘सातूं-आठूं’ की धूम: पारंपरिक रीति-रिवाजों से पूजी गईं मां गौरा, महेश्वर के साथ हुआ मिलन
विशेष रिपोर्ट
उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में लोक संस्कृति, कृषि और अटूट आस्था के प्रतीक प्रसिद्ध लोकपर्व ‘सातूं-आठूं’ (गौरा-महेश्वर उत्सव) की आज विशेष धूम देखने को मिल रही है। भाद्रपद माह में मनाए जाने वाले इस पावन पर्व पर समूचा क्षेत्र भक्तिमय और सांस्कृतिक रंगों में सराबोर हो उठा है।
🌸बिरुड़ धोने के बाद मां गौरा और भगवान महेश्वर की स्थापना
सोमवार को बिरुड़ पंचमी के साथ शुरू हुए इस उत्सव में महिलाओं ने पांच प्रकार के अनाजों (चना, मटर, गेहूं, गहत और मकई) को भिगोकर ‘बिरुड़ा’ तैयार किया था। इसके उपरांत सातूं पर्व के दिन महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा में जलाशयों पर जाकर बिरुड़े धोए और धान-तिल के पौधों (सौं) से मां गौरा की प्रतिमा तैयार कर उन्हें मंदिरों और पूजा पंडालों में स्थापित किया। आज आठूं पर्व के पावन अवसर पर भगवान महेश्वर (शिव) की प्रतिमा स्थापित कर दोनों का विधि-विधान से पूजन किया जा रहा है।
🌸पारंपरिक झोड़े, चाचरी और खेल की गूंज
प्रतिमाओं की स्थापना के साथ ही विभिन्न गांवों और शहरों के मंदिर परिसरों में महिलाओं द्वारा पारंपरिक कुमाऊंनी लोकगाथाएं, मङ्गल गीत और झोड़ा-चाचरी गाए जा रहे हैं। रंग-बिरंगे परिधानों में सजी महिलाएं गोल घेरा बनाकर गौरा-महेश की कथाओं का गायन कर रही हैं, जिससे समूचा माहौल उत्सवी हो गया है।
🌸अखंड सौभाग्य और परिवार की समृद्धि की कामना
ज्योतिषाचार्यों और बुजुर्गों के अनुसार, यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन की पौराणिक कथा पर आधारित है। महिलाएं अपने पतियों की दीर्घायु, बच्चों की सुख-समृद्धि और घर में खुशहाली के लिए निर्जला व्रत रखकर यह पूजा करती हैं। पूजा संपन्न होने के बाद ‘बिरुड़’ को सिर पर धारण कर प्रसाद के रूप में बांटा जाएगा।
इस पर्व के साथ ही कुमाऊं की घाटियों में सांस्कृतिक मेलों और झोड़ा-खेल की रौनक आगामी दिनों तक बनी रहेगी।