PYRE (चिता): 8 साल का संघर्ष, ऑस्कर का साथ और सिनेमाघरों में एक अंतहीन इंतज़ार की गूँज

PYRE (चिता): 8 साल का संघर्ष, ऑस्कर का साथ और सिनेमाघरों में एक अंतहीन इंतज़ार की गूँज

 

 

 

विशेष रिपोर्ट

एक फिल्म से परे: एक निर्देशक का आत्मसमर्पण

आज देश के कुछ चुनिंदा सिनेमाघरों (लगभग 80 स्क्रीन्स) पर एक ऐसी फिल्म प्रदर्शित हो रही है, जो बॉक्स ऑफिस के स्थापित गणित और बड़े सितारों की चकाचौंध से कोसों दूर है। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता निर्देशक विनोद कापड़ी की फिल्म ‘PYRE’ (चिता) केवल एक सिनेमाई प्रस्तुति नहीं है, बल्कि यह आठ वर्षों के मानसिक, व्यक्तिगत और आर्थिक संघर्ष से उपजी एक जीवंत और दर्दभरी दास्तान है।

 

 

 

 

जून 2018 में उत्तराखंड के मुनस्यारी प्रवास के दौरान विनोद कापड़ी की मुलाकात 84 वर्षीय केसर सिंह और उनकी पत्नी से हुई थी। पहाड़ का सन्नाटा, बुजुर्गों का अकेलापन और मुम्बई गए अपने बेटे का 28 साल लंबा अंतहीन इंतज़ार—इस दृश्य ने निर्देशक को भीतर तक झकझोर दिया। इसी मुलाकात से जन्मी ‘PYRE’ की कहानी।

 

 

 

‘PYRE’ का सफर सादगी और असाधारण प्रतिभा का एक अनोखा मिश्रण है। फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पेशेवर अभिनेताओं की जगह मुनस्यारी के स्थानीय निवासियों पदम सिंह कापड़ी (पदम) और हीरा देवी (तुलसी) ने मुख्य भूमिकाएँ निभाई हैं। पहली बार कैमरे के सामने आए इन बुजुर्गों ने अपनी वास्तविक ज़िंदगी के अनुभव से कहानी को अमर बना दिया।

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वर्ल्ड प्रीमियर: 28वें टालिन ब्लैक नाइट्स फिल्म फेस्टिवल (Tallinn Black Nights Film Festival) में ‘बेस्ट फिल्म – ऑडियंस अवार्ड’।

अंतरराष्ट्रीय सम्मान: दुनिया के 28 अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल्स में भागीदारी और 15 ‘बेस्ट फिल्म’ अवॉर्ड्स सहित कुल 18 पुरस्कार।

 

 

 

 

इसके साथ ही, अंतरराष्ट्रीय सिनेमा के दिग्गजों ने इसमें निस्वार्थ सहयोग दिया:

माइकल डाना (Mychael Danna): ऑस्कर विजेता संगीतकार ने फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर तैयार किया।

गुलज़ार साहब: हिंदी सिनेमा के महान गीतकार ने बिना किसी आर्थिक लेन-देन के इसके भावुक गीत लिखे।

पेट्रीशिया रोमल (Patricia Rommel): ऑस्कर विजेता जर्मन फिल्म एडिटर ने बिना किसी पारिश्रमिक के फिल्म का संपादन संभाला।“जिस फिल्म को ऑस्कर विजेताओं का संगीत और गुलज़ार साहब के शब्द मिले हों, उसे भारत के किसी स्टूडियो या ओटीटी प्लेटफॉर्म का सहारा न मिलना भारतीय फिल्म उद्योग की प्राथमिकताओं पर एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।”

 

 

 

फिल्म निर्माण के दौरान निर्देशक को अभूतपूर्व आर्थिक संकट झेलना पड़ा। बीच शूटिंग में मुख्य निर्माता के पीछे हटने और पैसे वापस मांगने पर विनोद कापड़ी ने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी जीवन भर की जमा पूंजी, म्यूचुअल फंड, जमीन और अपनी कार तक बेचकर कर्ज चुकाया।

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फेस्टिवल्स के दौर में जब सेल्स एजेंट्स ने हाथ खड़े कर दिए, तब 25 वर्षीय युवा सह-निर्माता अरिंद्र राय चौधरी फिल्म के साथ मजबूती से खड़े रहे। अंततः, लंदन निवासी सुरेश जोशी के सहयोग से फिल्म को सिनेमाघरों तक पहुँचाने का रास्ता साफ हुआ।

 

 

 

सुरेश जोशी के शब्दों में:“अगर मैंने इतनी सुंदर और ईमानदार फिल्म को सपोर्ट नहीं किया, तो फिर जीवन का कोई अर्थ नहीं है।”

 

 

 

‘PYRE’ हिमालय के पलायन, उम्र के ढलते पड़ाव और प्रेम की वह मर्मस्पर्शी कहानी है, जो हर संवेदनशील भारतीय के दिल को छूती है। बड़े प्रचार और बजट के बिना सिनेमाघरों तक पहुँची इस फिल्म का भविष्य अब पूरी तरह से दर्शकों के हाथ में है।

 

 

 

आज जब ‘PYRE’ सिनेमाघरों में पहुँच चुकी है, तो यह केवल विनोद कापड़ी की फिल्म नहीं रही, बल्कि हर उस दर्शक की अमानत है जो ईमानदार और सच्चे सिनेमा में विश्वास रखता है।

 

 

 

यदि आप पहाड़ों की संवेदनशीलता, बुजुर्गों के निश्छल प्रेम और एक निर्देशक के अटूट विश्वास को समर्थन देना चाहते हैं, तो अपने परिवार के साथ ‘PYRE’ को नजदीकी सिनेमाघरों में जरूर देखें।

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