अल्मोड़ा का ऐतिहासिक सूचना पट्ट: 93 साल पुराना ‘ब्लैक बोर्ड’, जो आजादी की जंग से लेकर खोई चीजों को मिलाने तक का गवाह है
अल्मोड़ा शहर की एक अनोखी परंपरा — लाला बाजार का खोया-पाया सूचना पट
चन्द्र शेखर पांडे की कलम से :-
अल्मोड़ा शहर के सबसे पुराने और प्रसिद्ध बाजार लाला बाजार में, नंदा देवी की ओर जाने वाली सीढ़ियों के पास आपने चलते-चलते दो पुराने से सूचना पट्ट जरूर देखे होंगे।
अगर आप कुछ पल के लिए यहां रुककर इन्हें ध्यान से देखें, तो आपको इन दोनों सूचना पटों पर आज भी कोई न कोई सूचना लिखी हुई जरूर दिखाई देगी।
और ये सूचनाएं होती हैं — खोई और पाई हुई चीजों से जुड़ी हुई।
किसी की चाबी बाजार में गिर गई हो…
किसी का पर्स कहीं छूट गया हो…
किसी का जरूरी कागजातों से भरा बैग रास्ते में गिर गया हो…
या फिर किसी ईमानदार व्यक्ति को रास्ते में ऐसी कोई चीज पड़ी हुई मिल गई हो और वह उसके असली मालिक तक पहुंचाना चाहता हो।
इन छोटी-छोटी चीजों के लिए लाला बाजार में मौजूद ये सूचना पट्ट आज भी एक बेहद अनोखी सुविधा का काम करते हैं।
लेकिन इन ब्लैक बोर्डों की कहानी सिर्फ खोया-पाया तक सीमित नहीं है…
स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार, इन सूचना पट्टों का संबंध आजादी के आंदोलन के दौर से भी जोड़ा जाता है।
बताया जाता है कि उस समय हमारे स्वतंत्रता सेनानियों को अंग्रेजों से बचने के लिए अलग-अलग स्थानों पर छिपकर रहना पड़ता था। ऐसे समय में खुले तौर पर संदेश पहुंचाना आसान नहीं था।
माना जाता है कि इन बोर्डों के माध्यम से उनके नेता अलग-अलग स्थानों पर मिलने या किसी निश्चित दिन किसी जगह एकत्र होने जैसे संदेश पहुंचाते थे।
बाद में, आजादी के बाद, यही सूचना पट्ट धीरे-धीरे खोया-पाया जैसी सामाजिक और जनोपयोगी व्यवस्था का माध्यम बन गए।
अल्मोड़ा के स्वर्गीय मधुसूदन गुरुरानी जी, जिन्हें शहर के प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक समाजसेवियों में याद किया जाता है, उन्ही को लाला बाजार में इस अनूठी सूचना पट्ट व्यवस्था को शुरू करने का श्रेय दिया जाता है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह बोर्ड करीब 93 वर्ष से भी अधिक पुराना है और इसे साल 1933 के आसपास का माना जाता है।
सोचिए…जब न मोबाइल था, न इंटरनेट, न व्हाट्सऐप और न ही सोशल मीडिया।
उस दौर में किसी व्यक्ति की खोई हुई चीज को उसके मालिक तक पहुंचाने के लिए एक साधारण सा ब्लैक बोर्ड लोगों के बीच भरोसे और ईमानदारी का माध्यम बन गया।
लेकिन आज के वक्त में एक बदलाव जरूर हुआ है,
इस सूचना पट्ट को संचालित करने वाले स्व. गुरुरानी जी के वंशिजों ने बताया कि अब किसी की खोई हुई चीजों को वापस करने का प्रतिशत 5 से भी कम रह गया है,
जबकि कभी-कभी तो कोई मिली हुई चीज को अपना बताने के लिए दो-तीन से ज्यादा लोग आ खड़े होते हैं.
हो सकता है यह वक्त का बदलाव हो.
बहरहाल आज भी पाई हुई चीजें उनके असली मालिकों तक पहुंचाने का माध्यम यह सूचना पट बना हुआ है.
आज भी आप लाला बाजार में नंदा देवी जाने वाली सीढ़ियों के पास कुछ पल रुककर इन बोर्डों को देखिए।
आपको किसी की खोई हुई चाबी की सूचना मिल सकती है…
किसी के पर्स का जिक्र मिल सकता है…
किसी जरूरी दस्तावेज के मिलने की सूचना दिखाई दे सकती है…
कभी-कभी एक साधारण सा ब्लैक बोर्ड, थोड़ी सी ईमानदारी और इंसानियत ही काफी होती है।
अपने दिमाग पर थोड़ा जोर डालकर सोचिए तो शायद देश में ऐसी अनूठी और वर्षों पुरानी खोया-पाया व्यवस्था बहुत कम जगह देखने को मिलेगी।
खैर.. मैं भी अपने स्कूल टाइम का एक अनुभव आपके सामने साझा करता हूं,
बात उस वक्त की है जब मैं अल्मोड़ा के विवेकानंद विद्या मंदिर में पढ़ता था , तो दोस्तों के साथ ज़ब छुट्टी के बाद स्कूल से बाजार होते हुए घर जाते थे तो यहां पर उत्सुकतावश कभी-कभी जरूर रुकते थे कि आज क्या चीज मिली,आज क्या चीज खोई.
लेकिन अगले दिन खोया पाया वाली चीज का अपडेट लेने की भी हमको जरूरत नहीं होती थी, शायद हमारा दिमाग ही उस चीज के लिए तैयार नहीं होता होगा.
खैर…अल्मोड़ा की पहचान सिर्फ उसके मंदिरों, पुराने मकानों और बाजारों से नहीं है…
बल्कि ऐसी छोटी-छोटी सामाजिक परंपराओं से भी है, जिन्हें यहां के लोगों ने पीढ़ियों से जीवित रखा है।
लाला बाजार का यह पुराना सूचना पट्ट उसी जीवित विरासत की एक खूबसूरत मिसाल है।