Champawat News:बग्वाल देवीधुरा मेला और त्यौहार,देवी को अर्पित किए जाते हैं ढालदार फर्रे,जाने बग्वाल त्यौहार से जुड़ी जानकारी

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बग्वाल मेला उत्तराखंड के चंपावत जिले के लोहाघाट से 45 किमी की दूरी पर स्थित देवीधुरा में मां वाराही देवी मंदिर में मनाया जाता है। देवीधुरा अल्मोडा, पिथोरागढ़ और नैनीताल जिलों का जंक्शन भी है और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है।

🔹बांस के रिंगाल से बनाए है फर्रे 

बाराही धाम देवीधुरा में मन्नत पूरी होने पर फर्रें चढ़ाए जाते हैं। 27 अगस्त से शुरू देवीधुरा के बगवाली मेले में तीन दिन में 21 फर्रें चढ़ाए जा चुके हैं। बगवाल के दिन यानी 31 अगस्त तक अभी कई और फर्रे चढ़ाए जाएंगे।बांस के रिंगाल से बनाएजाने वाले फर्रों का निर्माण मुख्य रूप से नैनीताल जिले के सुनी गांव के लोग करते हैं।

🔹मन्नत पूरी होने पर देवी को समर्पित करते है फर्रे

थाली के आकार से लेकर बड़े आकार के फर्रे बनाए जाते हैं। और लागत भी ढाई हजार से 18 हजार रुपये तक होती है। पीठाचार्य पंडित कीर्तिबल्लभ जोशी का कहना है कि मन्नत पूरी होने पर बाराही देवी को इन्हीं फर्रों को समर्पित करने की परंपरा है। ये फर्रें फल-फूल से खेली जाने वाली बगवाल में बचाव के लिए ढाल का काम भी करते हैं। मंगलवार को सालम जैंती निवासी धरम सिंह ने मां बाराही देवी को फर्रे चढ़ाए।

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🔹चारों खामों ने किए धार्मिक अनुष्ठान

देवीधुरा में मंगलवार को विभिन्न अनुष्ठानों के साथ पूजन हुआ। पीठाचार्य पंडित कीर्तिबल्लभ जोशी के मंत्रोच्चार में सुबह छह बजे से चार खाम और सात थोक सहित पुजारियों ने पूजा-अर्चना की। धार्मिक अनुष्ठान में लमगड़िया खाम के वीरेंद्र सिंह, गहड़वाल खाम के त्रिलोक सिंह बिष्ट, विमल बिष्ट, चम्याल खाम के गंगा सिंह, वालिक खाम के बद्री सिंह, महादेव पुजारी, महेश चंद्र आदि मौजूद थे। वहीं युवा मुख्य मंदिर को फूलों से सजा रहे हैं।

🔹बग्वाल मेले का इतिहास

पौराणिक कथा के अनुसार, ‘खाम’ के नाम से जाने जाने वाले लोगों के सदस्यों से हर साल माँ वाराही (बाराही) को उपहार के रूप में एक आदमी (नरबली) की बलि देने की परंपरा हुआ करती थी। ऐसे ही एक वर्ष में, एक बूढ़ी महिला की बारी थी कि वह अपने इकलौते पोते को माँ वाराही को उपहार में दे। अनिच्छा से और बड़े दुःख के साथ उसने अपने पोते को बलिदान के लिए तैयार किया। उसके दुःख और उसकी भक्ति को देखकर, माँ वाराही अपने पोते के जीवन को इस शर्त पर देने के लिए सहमत हो गई कि एक आदमी के शरीर में मौजूद रक्त के बराबर मात्रा में उसे अर्पित किया जाना चाहिए। उस दिन के बाद से बग्वाल मेला मनाया जाता है, जहां खाम सदस्य एक-दूसरे को घायल करने के लिए एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं और सामूहिक रूप से मां वाराही को बलिदान के रूप में अपना खून चढ़ाते हैं।

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🔹शिविर में 22 लोगों के दिव्यांग प्रमाणपत्र बने

वहीं देवीधुरा मेले में मंगलवार को लगे बहुउद्देश्यीय शिविर में लोगों की प्रमाणपत्र की दिक्कतों को दूर किया गया। 22 लोगों के दिव्यांग प्रमाण पत्र बनाए गए। 10 वृद्धावस्था और 6 दिव्यांग पेंशन बनाए गए। स्वास्थ्य विभाग ने 327 लोगों का परीक्षण किया। तीन महिलाओं को महालक्ष्मी किट, नौ लोगों के बिजली बिलों में सुधार किया गया। मंदिर कमेटी के अध्यक्ष मोहन सिंह बिष्ट, संरक्षक लक्ष्मण सिंह लमगड़िया, डीएसडब्लूओ आरएस सामंत, एसीएमओ डॉ. इंद्रजीत पांडेय, डॉ. विनोद जोशी, डा. शौर्य सिंह, डॉ. गुरशरण कौर, डॉ. रितिका सिंह आदि मौजूद थे।