सत्य और स्वराज का संदेश: महात्मा गांधी और उत्तराखंड के ऐतिहासिक रिश्तों की एक झलक:-चन्द्रशेखर तिवारी दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र, देहरादून के शोधकर्ता 

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सत्य और स्वराज का संदेश: महात्मा गांधी और उत्तराखंड के ऐतिहासिक रिश्तों की एक झलक:-चन्द्रशेखर तिवारी दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र, देहरादून के शोधकर्ता

 

 

 

 

 

देहरादून। भारतीय स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचार और उनके आंदोलन केवल देश के मैदानी हिस्सों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि हिमालय की सुरम्य वादियों में भी उन्होंने जन-जागरण की मजबूत नींव रखी। वर्ष 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद से लेकर आजादी के ठीक पहले 1947 तक, गांधी जी ने उत्तराखंड (तत्कालीन संयुक्त प्रांत के कुमाऊं व गढ़वाल क्षेत्र) के कई ऐतिहासिक दौरे किए

 

 

 

 

 

दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र, देहरादून के शोधकर्ता चन्द्रशेखर तिवारी की परिकल्पना पर आधारित यह दस्तावेज गांधी जी के उत्तराखंड प्रवास और राज्य के साथ उनके गहरे भावनात्मक व राजनीतिक जुड़ाव को रेखांकित करता है।
महात्मा गांधी के उत्तराखंड दौरे

 

 

(1915-1947): एक अवलोकन| क्रम संख्या | तारीख / कालखंड | मुख्य स्थान / जगह | यात्रा का उद्देश्य एवं महत्वपूर्ण घटनाएं
5 अप्रैल – 8 अप्रैल, 1915 | हरिद्वार, ऋषिकेश, स्वर्गाश्रम | दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद महाकुंभ मेले के अवसर पर पहली बार आगमन। 6 अप्रैल को महात्मा मुंशीराम (स्वामी श्रद्धानंद) से भेंट की और ऋषिकेश-लक्ष्मण झूला का भ्रमण किया। 18 मार्च – 22 मार्च, 1916 हरिद्वार (गुरुकुल कांगड़ी), देहरादून स्वामी श्रद्धानंद के आग्रह पर गुरुकुल कांगड़ी के वार्षिकोत्सव और अछूतोद्धार सम्मेलन में भाग लिया और व्याख्यान दिया। इसी दौरान देहरादून के छात्रों से भी भेंट हुई।

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3 मध्य मार्च, 1927 हरिद्वार गुरुकुल कांगड़ी के रजत जयंती समारोह और राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों में भाग लेने पहुंचे। 14 जून – 2 जुलाई, 1929 कुमाऊं क्षेत्र (हल्द्वानी, भवाली, ताड़ीखेत, अल्मोड़ा, बागेश्वर, कौसानी) गांधी जी की पहली ऐतिहासिक कुमाऊं यात्रा। स्वराज फंड के लिए धन जुटाया। कौसानी में 12-14 दिन का लंबा प्रवास किया, जहां उन्होंने कौसानी को “भारत का स्विट्जरलैंड” कहा और ‘अनासक्ति योग’ पुस्तक की भूमिका लिखी।

 

 

 

सितंबर – अक्टूबर, 1929 हरिद्वार, देहरादून, मसूरी | सितंबर में हरिद्वार होते हुए देहरादून पहुंचे, जहां कन्या गुरुकुल का भ्रमण किया और शहंशाह आश्रम में पीपल का पौधा लगाया। इसके बाद 17 से 25 अक्टूबर 1929 तक मसूरी का पहला दौरा किया।

 

 

 

18 जून – 22 जून, 1931 नैनीताल | शिमला से सीधे नैनीताल पहुंचे। यहां 5 दिन रुककर संयुक्त प्रांत के गवर्नर सर मैल्कम हेली से मुलाकात की और स्वतंत्रता आंदोलन की रणनीति व स्थानीय किसानों/जमींदारों की समस्याओं पर चर्चा की।

 

 

28 मई – 8 जून, 1946 देहरादून, मसूरी | स्वास्थ्य लाभ के लिए मसूरी का दूसरा दौरा। वे हैप्पी वैली स्थित बिड़ला हाउस (हर्मिटेज) में ठहरे। उन्होंने सिल्वर्टन मैदान में नियमित प्रार्थना सभाएं कीं और गरीबों के लिए चंदा इकट्ठा किया।

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21 जून, 1947 हरिद्वार विभाजन की विभीषिका के दौरान गांधी जी का अंतिम उत्तराखंड दौरा। यहां उन्होंने पंजाब और उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत से आए शरणार्थियों से मुलाकात की और उनका दुख-दर्द बांटा। “सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही सच्चा स्वराज मिल सकता है।” — महात्मा गांधी

 

 

 

 

कुमाऊं से गढ़वाल तक चेतना की अलख
गांधी जी की इन यात्राओं ने उत्तराखंड के जनमानस पर अमिट छाप छोड़ी। 1929 की कुमाऊं यात्रा के दौरान कौसानी के प्राकृतिक सौंदर्य से प्रभावित होकर उन्होंने इसे ‘भारत का स्विट्जरलैंड’ की संज्ञा दी थी और यहीं बैठकर अपनी सुप्रसिद्ध कृति ‘अनासक्ति योग’ की भूमिका पूरी की।
हरिद्वार के कुंभ मेले से शुरू हुआ यह सफर 1947 में विभाजन के विस्थापित शरणार्थियों का दुख-दर्द बांटने तक जारी रहा। देहरादून, मसूरी, नैनीताल, अल्मोड़ा और बागेश्वर जैसे स्थलों पर गांधी जी के आगमन ने न केवल स्थानीय लोगों में देशप्रेम का जज्बा भरा, बल्कि कुली-बेगार और खादी जैसे सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों को भी नई ऊर्जा प्रदान की।

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